Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८३ ] [ १८९

लोकोनो झघडो छे ने के व्यवहारथी निश्चय थाय अने निमित्तथी उपादाननुं कार्य थाय-तेनो अहं खुलासो छे. ‘निमित्तथी’ एम कह्यु एनो अर्थ ज ए छे के निमित्त छे बस. संसार अवस्थामां पुद्गलकर्मनुं निमित्त छे. पण निमित्तथी-कर्मथी जीवनी संसार अवस्था कराई छे एम नथी. मिथ्यत्वादि जे विकार थाय तेमां दर्शनमोहकर्मनो उदय निमित्त छे, पण ए विकारनी आदिमां कर्म नथी, आत्मा छे अहीं आ वात सिद्ध करवी छे के कर्मनो उदय छे माटे विकार थयो छे एम नथी.

परमात्मप्रकाशनी गाथा ६८मां तो एम सिद्ध कर्युं छे के विकारी दशानुं कर्ता पुद्गलकर्मनिमित्त तो नथी ए तो ठीक, एनुं कर्ता आत्मद्रव्य पण नथी. विकारी पर्यायनो कर्ता विकारी पर्याय छे. एक समयमां विकार जे मिथ्यात्वादि परिणाम थाय छे तेमां तेना षट्कारकनुं परिणमन पर्यायमां स्वतंत्र छे; तेने द्रव्य-गुणनी के निमित्तथी अपेक्षा नथी, केमके द्रव्य-गुण त्रिकाळ शुद्ध छे अने निमित्त परवस्तु छे.

जुओ, द्रव्य सिद्ध करवुं होय त्यारे एम कहे के उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यो (गुण-पर्यायो) कर्ता अने द्रव्य तेनुं कर्म. प्रवचनसार गाथा ९६मां आ वता लीधी छे. उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यो अर्थात् गुणो अने पर्यायो द्रव्यना कर्ता छे, करण छे, अधिकरण छे, केमके एनाथी द्रव्यथी सिद्ध थाय छे. बीजी अपेक्षाथी कहीए तो गुण-पर्यायोनुं अर्थात् उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यनुं कर्ता, करण, अधिकरण द्रव्य छे कारण के द्रव्य तेमां व्यापक छे. त्यां वस्तुनी स्थिति अर्थात् अस्तित्व सिद्ध करवानी वात छे. अहीं ए वात नथी.

अहीं कहे छे के विकारी परिणामनो कर्ता विकारी पर्याय छे छतां अभेदथी कहेतां तेनो कर्ता आत्मा छे. विकारनी आदिमां पर्याय अथवा द्रव्य आत्मा छे. पर्यायने अभेद गणीने आत्माने कर्ता कह्यो छे. तेवी रीते सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप निर्विकार पर्याय पोताना षट्कारकथी परिणमे छे छतां भेदथी तेनो कर्ता आत्मा छे एम कह्युं छे. अहीं तो एम सिद्ध करवुं छे के कर्मनो अभाव थयो माटे मोक्षमार्ग के मोक्षपद प्रगट थयुं- एम नथी. चार घाती कर्मन नाश थतां केवळज्ञान प्रगट थयुं एम तत्त्वार्थसूत्रमां आवे छे, पण ए तो त्यां निमित्तथी वात करी छे. खरेखर तो केवळज्ञाननी प्राप्तिना काळमां केवळज्ञान प्रगट थयुं छे. तेनी आदिमां आत्मा छे. एथी सूक्ष्म विचारीए तो केवळज्ञाननी आदिमां खरेखर केवळज्ञाननी पर्याय छे. अरे! लोकोने पोतानी स्वतंत्रता शुं चीज छे ते बेठुं नथी.

निश्चयथी पर्यायनुं कर्ता द्रव्य नथी, केमके पर्यायनी आदिमां पर्याय छे. सम्यग्दर्शन- ज्ञान-चारित्रनी पर्यायनी आदिमां आत्मा छे ए तो पर्यायने द्रव्यमां अभेद गणीने कह्युं छे. सम्यग्दर्शननी पर्यायमां आखा द्रव्यनी श्रद्धा आवे छे, द्रव्य आवतुं नथी. सम्यग्ज्ञाननी पर्यायमां द्रव्य जेवुं परिपूर्ण छे तेवुं तेनुं ज्ञान आवे छे. खरेखर तो