१९० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
द्रव्य संबंधीनुं ज्ञान जे पर्यायमां आवे छे ते पर्यायनुं ज्ञान पर्यायमां आवे छे. वळी द्रव्य छे माटे द्रव्यनुं ज्ञान पर्यायमां थाय छे एम नथी. ज्ञाननी पर्यायमां एटली ताकात छे के द्रव्यनुं ज्ञान, पोतानुं ज्ञान अने लोकालोकनुं ज्ञान ते एक समयमां करी ले छे. श्रुतज्ञानमां पण आवुं सामर्थ्य छे. लोकलोकनुं ज्ञान पण पर्यायमां पोताथी थाय छे, लोकलोक छे माटे पर्यायमां एनुं ज्ञान थाय छे एम नथी. पर्यायमां द्रव्यनुं ज्ञान थाय छतां द्रव्य पर्याय आवतुं नथी अहाहा...! द्रव्य पर्यायने स्पर्शतुं नथी अने पर्याय द्रव्यने स्पर्शती नथी. अहो! वस्तुनी स्वतंत्रतानी आवी अलौकिक वात छे! अहीं वात लीधी नथी. अहीं तो एम बताववुं छे के मोक्षमार्गनी पर्यायमां तेनी आदिमां आत्मा छे पण कर्मनो अभाव के व्यवहारनो राग तेनी आदिमां नथी. व्यवहारनो राग छे तो निश्चय मोक्षमार्ग प्रगटयो छे एम नथी. निश्चयथी तो स्वभावनो आश्रय ले छे ते ज साक्षात् मोक्षमार्गनुं कारण छे.
उत्तरः– अरे भगवान! आ सम्यक् एकांत छे. निमित्त देखीने, सहचारी देखीने व्यवहारना रागने उपचारथी मोक्षमार्ग कह्यो छे. पंचास्तिकायमां शुभरागने व्यवहारसाधन कह्युं छे. व्यवहारसाधन अने निश्चय साध्य एमज कह्युं छे ए तो भिन्न साध्यसाधननी अपेक्षाथी कह्युं छे. पण भाई! साधन बे नथी, साधननुं निरूपण बे प्रकारे छे. साधन तो एक ज छे. मोक्षमार्गप्रकाशमां पंडितप्रवर टोडरमलजीए निश्चय-व्यवहारनुं रहस्य अत्यंत स्पष्ट खोली दीधुं छे. त्यां कह्युं छे के - ‘मोक्षमार्ग तो बे नथी पण मोक्षमार्गनुं निरूपण बे प्रकारथी छे. साचुं निरूपण ते निश्चय तथा उपचार निरूपण ते व्यवहार.’ आम यथार्थ मोक्षमार्ग एक ज छे. मोक्षमार्ग कहो, कारण हो, उपाय हो के साधन कहो-ते एक ज छे, बे नथी. आ परम सत्य छे. त्यारे कोई कहे छे के थोडुं तमे ढीलुं मूको अने थोडुं अमे ढीलुं मूकीए तो बंनेनी एकताथई जाय. पण बापु! आमां बांधछोने कयां अवकाश छे? वस्तुना स्वरूपनो निर्णय, सत्यनो निर्णय बांधछोडथी केम थाय? भाई! विवादथी के बांधछोडथी सत्य हाथ न आवे. सत्य तो सत्यने जेम छे तेम समजवाथी ज प्राप्त थाय. प्रश्नः– शास्त्रमां अकलंकदेवे बे कारणथी कार्य थाय एम कह्युं छे? उत्तरः– हा, पण ए तो निमित्तनुं त्यां ज्ञान कराव्युं छे. प्रमाणज्ञानमां निमित्तनुं ज्ञान कराव्युं छे पोतानी पर्याय पोताथी थाय छे ए वातनो निषेध करीने निमित्तनुं ज्ञान कराव्युं छे एम नथी. निश्चयथी कार्य पोताथी थयुं छे, निमित्तथी नहि ए वातने राखीने प्रमाणमां निमित्तनुं ज्ञान कराव्युं छे. अन्यथा प्रमाणज्ञान ज रहेशे नहि. मोक्षमार्गप्रकाशकमां सातमां अधिकारमां अति स्पष्टपणे कह्युं छे के यथार्थ निरूपण ते