समयसार गाथा ८३ ] [ १९१
निश्चय अने उपचा निरूपण ते व्यवहार. वळी त्यां कह्युं छे के- व्यवहारनय स्वद्रव्य-परद्रव्यने वा तेना भावोने वा कारण-कार्यादिने कोईना कोईमां मेळवी निरूपण करे छे माटे एवा श्रद्धानथी मिथ्यात्व छे तेथी तेनो त्याग करवो, वळी निश्चयनय तेने ज यथावत् निरूपण करे वे तथा कोईने कोईमां मेळवतो नथी तेथी एवा ज श्रद्धानथी सम्यक्त्व थाय छे माटे तेनुं श्रद्धान करवुं.’
“प्राणीओने भेदरूप व्यवहारनो पक्ष तो अनादिकाळथी ज छे-अने एनो उपदेश पण बहुधा सर्व प्राणीओ परस्पर करे छे. वळी जिनवाणीमां व्यवहारनो उपदेश शुद्धनयनो हस्तावंब जाणी बहु कार्यो छे; पण एनुं फळ संसार ज छे.” जुओ, व्यवहार आवे छे खरो, एनुं अनुसरण करवा लायक नथी केमके एनुं संसार ज छे.
त्यारे कोई कहे छे के आ तो एकांत छे; एकांत छोडी देवुं जोईए.
पण भाई! सम्यक् एकांतनुं ज्ञान थाय त्यारे पर्याय अने रागनुं एटले के अनेकांतनुं यथार्थ ज्ञान थाय छे. सम्यक् एकांतवाळाने सम्यक् अनेकांतनुं साचुं ज्ञान थाय छे. जेने सम्यक् एकांतनुं ज्ञान नथी एने अनेकांतनुं साचुं ज्ञान नथी. श्रीमद् एकांतनुं ज्ञान नथी एने विपरीत ज्ञान छे. एने एनकांतनुं साचुं ज्ञान नथी. श्रीमद् राजचंद्रजीए कह्युं छे- ‘सम्यक् एकांत एवा निजपदनी प्राप्ति सिवाय अनेकांत अन्य हेतुए उपकारी नथी..’ सम्यक् एकांत एवा एटले आत्माना आश्रयथी ज्यां दर्शन-ज्ञान प्रगट थयुं त्यां अनेकांतनुं एटले राग अने पर्यायनुं पण साचुं ज्ञान होय छे.
भाई! आ तो अंतरमां जवानी, पर्यायने अंदर झुकाववानी वात छे. द्रव्यनी सन्मुख थई द्रव्योना आश्रय करवाथी सम्यग्दर्शन थाय छे. पर्यायना के व्यवहारना आश्रये सम्यग्दर्शन थतुं नथी. अरे! निर्मळ पर्यायना आश्रये पण धर्म प्रगट थतो नथी तो पछी रागना के व्यवहारना आश्रये सम्यग्दर्शन थाय ए वात कयां रही?
वादविवाद मूकीने प्रभु! आ समजवा जेवुं छे. भाई! तुं भगवान छो ने! छतां तारी अशुद्धता पण मोटी! अनुभवप्रकाशमां श्री दीपचंदजीए कह्युं छे के - त्रणलोकना नाथ तीर्थंकरद्रवना समोसरणमां अनंतवार गयो छतां ते अुशद्धता न छोडी. त्रणलोकना नाथ अर्हंत परमात्मानी दिव्य वाणी अनंतवार सांभळी. समोसरणमां अनंतवार मणिरत्न्ना दीव, हीराना थाळ अने कल्पवृक्षना फूलथी जिनभगवाननी पूजा करी. ‘जय हो, जय हो-’ एम भगवाननो अनंतवार जयजयकार कर्यो. परमात्माप्रकाशमां पण आवे छ के भवेभवे भगवाननी पूजा करी. पण भाई! परद्रव्यनी पूजानो ए तो