१९२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
विकल्प हतो. प्रभु! स्वाश्रय कर्या विना अशुद्धचा केम मटे? महाविदेहक्षेत्रमां ज्यां साक्षात् तीर्थंकर बिराजे छे त्यां अनंतवार जन्म्यो, पण तेथ शुं?
अनंतवार गयो पण सम्यग्दर्शन पाम्यो नहि. जुओ, सिद्धक्षेत्रमां ज्यां परमात्मा बिराजने छे तेमना पेटना क्षेत्रमां निगोदना अनंत जीवो अवगाहना लई पडया छे. परंतु बन्नना क्षेत्र अने भाव भिन्न छे. एकना कारणे बीजामां कांई थाय एम ज नहि.
आठमी गाथामां आचार्यदेव शिष्यने आत्मानो बोध करतां कहे छे के -‘दर्शन-ज्ञान- चारित्रने जे हंमेशा प्राप्त होय ते आत्मा छे’ आटलो भेद पडयो माटे व्यवहार छे. पोतानी निश्चय चीजने समजाववामां व्यवहार आवे छे. समज्या विना पोतानुं कार्य शी रीते करे? तेथी व्यवहार आवे छे. पण त्यां ज कह्युं छे के उपदेश करनारे के सांभळनारे व्यवहार अनुसरवा योग्य नथी. वळी पुरुषार्थसिद्धयुपायमां तो एम कह्युं छे के धर्मात्मा संतो अज्ञानीने व्यवहार द्वार निश्चय वस्तुने समजावे छे त्यां जे एकला व्यवहारने पकडे छे ते उपदेश सांभळवाने पात्र ज नथी. भाई! निश्चयने समजाववा माटे व्यवहार कह्यो छे एम यथार्थ समजी द्रव्य उपर द्रष्टि स्थाप. भेदथी छे, समजाव्यु पण भेद उपर लक्ष न आप, अभेदनुं लक्ष कर. अहाहा...! वस्तु तो आवी छे धर्म पण आवो छे अने धर्मी पण आवो होय छे.
प्रश्नः– प्रथम तो व्यवहार ज होय ने?
उत्तरः– ना, व्यवहार पहेलो होतो नथ. ज्यारे निश्चय प्रगट थाय त्यारे जे राग छे तेने व्यवहार कहेवामां आवे छे.
प्रश्नः– व्यवहार करतां करतां धर्मथई जाय एम छे के नहि?
उत्तरः– एम बीलकुल नथी. राग करतां करतां अराग थई जाय एम केम होई शके? रागनी दशानी दिशा पर तरफ छे अने अरागी धर्मनी दशा स्व तरफ छे. अरे! पर तरफ लक्ष करै अने स्व तरफ आवे एम केवी रीते बने? न ज बने. चाले आथमणु अने पहोंचे उगमणे एम बने? न ज बने. राग तो अंधकार छे. ते अधंकारथी चैतन्यमय प्रकाश केम प्राप्त थाय? न ज थाय. भाई! वस्तु ज आवी छे. व्यवहारथी निश्चय थाय ए मान्यता एक मोटुं शल्य छे. ज्यां व्यवहारने साधन कह्युं छे त्यां धर्मीने निश्चय जे प्रगट छे एनो आरोप आपीने उपचारथी कह्युं छे खरेखर व्यवहार ते साधन नथी.
कळश (४०) मां आवे छे के ‘घीनो घडो’ छे ते माटीमय छे, घीमय नथी.