Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८३ ] [ १९३

‘घीनो घडो’ तो व्यवहारथी कह्युं. तेम भाई! तारी चीज-निश्चय वस्तुने समजाववा व्यवहार द्वारा कही. पण त्यां जे एकला व्यवहारने ज पकडे छे ते देशनाने पात्र नथी.

‘आदि-मध्य-अंत’-कहीने आ गाथामां अलौकिक वात करी छे. राग थाय वा सम्यग्दर्शन थाय एनी आदि-मध्य-अंतमां आत्मा छे. कोई व्यवहारनी अपेक्षा राखीने सम्यग्दर्शन थयुं छे एम नथी. तथा निमित्तथी अपेक्षा विकारीथाय छे एम नथी. भावार्थमां घणुं भरी दीधुं छे.

पुद्गलकर्मना निमित्ते संसारयुक्त अथवा संसाररहित अवस्थारूपे आत्मा स्वयं परिणमन करे छे. कर्मनुं निमित्त हो, पण विकाररूपे पोते स्वयं परिणमे छे. प्रवचनसारमां ३४मां ईश्वरनयन आवे छे. त्यां कह्युं छे के-‘आत्मद्रव्य ईश्वरनये परतंत्रता भोगवनार छे.’ पोते स्वतंत्रपणे कर्मने वश थाय छे. कर्म तेने आधीनकरे छे. एम नथी. धावनी दुकाने धवडाववामां आवता मुसाफरना बाळकनी माफक जीव स्वतंत्रपणे परवश थाय छे. निमित्त एने वश करे छे एवुं त्रणकाळमां नथी. मूळ नियम अने सिद्धांत न समजे अने उपर उपरथी पकडे तो सत्य वस्तु समजमां नहि आवे. व्यवहारथी थाय अने निमित्तथी थाय एममानी ले तो निश्चयनुं स्वरूप नहि समजाय.

परथी थाय एवी मान्यतावाळाने परनो आदर अने स्वनो अनादर छे. अहा! जेने रागनां रुचि अने प्रेम छे तेने निर्विकार निज चैतन्यमय भगवान प्रति द्वेष करे छे. राग- द्वेषनी आवी व्याख्या छे. व्यवहाररत्नत्रयना राग प्रत्ये जेने प्रेम छे तेने भगवान आत्मा प्रति अरुचि अने द्वेष छे. अने जेने भगवान आत्मानी रुचि थई छे तेने रागनी रुचि उडी गई छे. राग रहे छे पण रागनी रुचि उडी गई छे. समयसार गाथा ७३मां आवी गयुं छे के विकारनो स्वामी पुद्गल छे. रागना स्वामीपणे हुं सदाय परिणमतो नथी एवो हुं निमर्म छुं. आ धर्मी समकितीनी वात छे. पण सम्यग्दर्शन थया पहेलां पण विकल्प द्वारा आवो ज निर्णय करे छे के भविष्यमां राग थशे एना स्वामीए हुं नहि परिणमुं. व्यवहार आवशे पण व्यवहारना स्वामीपणे नहि परिणमुं केमके हुं तो निमर्म एटले ममतारहित छुं. प्रभु! तारो मार्ग आवो छे. तुं वीतरागस्वरूप प्रभु छो. व्यवहार तो तारी प्रभुतामां लांछन छे. रागथी तारी प्रभुताने झांखप लागी छे.

चारे बाजुथी देखो तो सत्य सिद्धांत खडो थाय छे. पहेलो व्यवहार आवे छे एम छे नहि. जेने निश्चयना आश्रये धर्म प्रगटयो छे तेना रागने व्यवहार कहेवामां आवे छे कोई जगाए एम वात आवे के व्यवहारथी शुद्धिनी वृद्धि थाय छे. पण एनो अर्थ एम छे के छठ्ठे गुणस्थाने जे निर्मळ परिणतिनी शुद्धि छे ते सातमा गुणस्थानमां