Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१९४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

शुद्धिनी वृद्धि थाय छे. पूर्वनी जे शुद्धि छे ते पछीनी शुद्धिनी वृद्धिनुं कारण छे. त्यां साथे जे राग छे तेने उपचारथी शुद्धिनी वृद्धिनुं कारण कह्युं छे. सर्वत्र निश्चय-व्यवहारनुं लक्षण आ प्रमाणे ज जाणवुं एम श्री टोडरमलजीए कह्युं छे. पंचास्तिकायमां व्यवहार साध्य-साधननी वात करी छे. त्यां आत्मानो स्वनो आश्रय लीधो छे. ते निश्चय साधन छे अने साथे जे राग छे तेने उपचारथी साधन कह्युं छे, पण ते खरुं साधन नथी.

रागथी भिन्न प्रज्ञाछीणी वडे जे अनुभव प्रगट थयो ते अनुभव निश्चय साधन छे; साथे जे राग छे तेने आरोप आपीने उपचारथी साधन कह्युं छे. निश्चय-व्यवहारनो यथार्थ अर्थ न समजे अने बीजो अर्थ करे तो शुं थाय? अनर्थ ज थाय. वस्तुस्थिति तो आवी छे भाई!

आ प्रमाणे आत्मा पोताना रागनो अथवा मोक्षमार्गनो कर्ता-भोक्ता छे, पुद्गलकर्मनो कर्ता-भोक्ता कदी नथी. कर्म निमित्त पण तेकर्म आत्माना रागनुं अथवा मोक्षमार्गनुं कर्ता नथी. आत्मा पोताना विकारी-निर्विकारी परिणमननो कर्ता-भोक्ता छे पण परनो- पुद्गलकर्मने कर्ता-भोक्ता नथी. आवुं ज वस्तुस्वरूप छे.

[प्रवचनं. १३९ शेष, १४० थी १४२ * दिनांद २८-७-७६ थी ३१-७-७६]