अथ व्यवहारं दर्शयति–
तं चेव पुणो वेयइ पोग्गलकम्मं
तच्चैव
हवे व्यवहार दर्शावे छेः-
गाथार्थः– [व्यवहारस्य तु] व्यवहारनयनो ए मत छे के [आत्माः] आत्मा [नैकविधम्] अनेक प्रकारना [पुद्गलकर्म] पुद्गलकर्मने [करोति] करे छे [पुनः च] अने वळी [तद् एव] ते ज [अनेकविधम्] अनेक प्रकारना [पुद्गलकर्म] पुद्गलकर्मने [वेदयते] ते भोगवे छे.
टीकाः– जेम, अंदरमां व्याप्यव्यापकभावथी माटी घडाने करे छे अने भाव्यभावकभावथी माटी ज घडाने भोगवे छे तोपण, बहारमां, व्याप्यव्यापकभावथी घडाना १संभवने अनुकूळ एवा (इच्छारूप अने हस्तादिकनी क्रियारूप पोताना) व्यापारने करतो अने घडा वडे करेलो पाणीनो जे उपयोग तेनाथी ऊपजेली तृप्तिने (पोताना तृप्तिभावने) भाव्यभावकभाव वडे अनुभवतो-भोगवतो एवो कुंभार घडाने करे छे अने भोगवे छे एवो लोकोनो अनादिथी रूढ व्यवहार छे; तेवी रीते, अंदरमां व्याप्यव्यापकभावथी पुद्गलद्रव्य कर्मने करे छे अने भाव्यभावकभावथी पुद्गलद्रव्य ज कर्मने भोगवे छे तोपण, बहारमां, व्याप्यव्यापकभावथी अज्ञानने लीधे पुद्गलकर्मना संभवने अनुकूळ एवा (पोताना रागादिक) परिणामने करतो अने पुद्गलकर्मना विपाकथी उत्पन्न थयेली विषयोनी जे निकटता तेनाथी ऊपजेली (पोतानी) सुखदुःखरूप परिणतिने भाव्यभावकभाव वडे अनुभवतो-भोगवतो एवो जीव पुद्गलकर्मने करे छे अने भोगवे छे एवो अज्ञानीओनो अनादि संसारथी प्रसिद्ध व्यवहार छे.
भावार्थः– पुद्गलकर्मने परमार्थे पुद्गलद्रव्य ज करे छे; जीव तो पुद्गलकर्मनी उत्पत्तिने अनुकूळ एवा पोताना रागादिक परिणामोने करे छे. वळी पुद्गलद्रव्य ज पुद्गलकर्मने भोगवे छे; जीव तो पुद्गलकर्मना निमित्तथी थता पोताना रागादिक ________________________________________________________________________ १. संभव=थवुं ते; उत्पत्ति