१९६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
परिणामोने भोगवे छे. परंतु जीव अने पुद्गलनो आवो निमित्तनैमित्तिकभाव देखीने अज्ञानीने एवो भ्रम छे के पुद्गलकर्मने जीव करे छे अने भोगवे छे. आवो अनादि अज्ञानने लीधे अनादि काळथी प्रसिद्ध व्यवहार छे. परमार्थे जीव-पुद्गलनी प्रवृत्ति भिन्न होवा छतां, ज्यां सुधी भेदज्ञान न होय त्यां सुधी बहारथी तेमनी प्रवृत्ति एक जेवी देखाय छे. अज्ञानीने जीव-पुद्गलनुं भेदज्ञान नहि होवाथी उपलक द्रष्टिए जेवुं देखाय तेवुं ते मानी ले छे; तेथी ते एम माने छे के जीव पुद्गलकर्मने करे छे अने भोगवे छे. श्री गुरु भेदज्ञान करावी, परमार्थ जीवनुं स्वरूप बतावीने, अज्ञानीना ए प्रतिभासने व्यवहार कहे छे. * * * समयसार गाथा ८४ः मथाळुं हवे अज्ञानीनो रूढ व्यवहार दर्शावे छे. अज्ञानी शुं माने छे ते स्पष्ट करीने भेदज्ञान करावे छे. * गाथा– ८४ः टीका उपरनुं प्रवचन * ‘जेम, अंदरमां व्याप्यव्यापकभावथी माटी घडाने करे छे अने भाव्यभावकभावथी माटी ज घडाने भोगवे छे तोपण, बहारमां, व्याप्यव्यापकभावथी घडाना संभवने अनुकूळ एवा व्यापारने करतो अने घडा वडे करेलो पाणीनो जे उपयोग तेनाथी ऊपजेली तृप्तिने भाव्यभावकभाव वडे अनुवतो-भोगवतो एवो कुंभार घडाने करे छे अने भोगवे छे एवो लोकोना अनादिथी रूढ व्यवहार छे’- शुं कहे छे? के व्याप्यव्यापकभावथी माटी घडानी पर्यायने करे छे, कुंभार नहि. प्रश्नः– आ वात गळे उतरती नथी ने? उत्तरः– आ वात गळे उतारवी पडशे. वस्तुनुं स्वरूप ज एम छे. अहीं तो कहे छे के व्यवहारनो जे शुभराग छे तेने पोतानुं कर्तव्य मानी तेनो कर्ता थाय छे. तेने आत्मा हेय थई जाय छे. रागने उपादेय माननारे अमृतस्वरूप भगवान आत्माने हेय मान्यो छे. जेम कोई महापुरुष घेर आवे तेने छोडीने नाना बाळक साथे वात करवा लागी जाय तो ते महापुरुषनो अनादर छे. तेम त्रणलोकनो नाथ भगवान अंदर महान चीज पडी छे तेनी सन्मुख न थतां राग सामे लक्ष करीने आनंद माने तो ते भगवान आत्मानो अनादर छे. परमात्मप्रकाश गाथा ३६मां लख्युं छे के -“अत्र सदैव परमात्मा वीतरागनिविकल्प– समाधिरतानामुपादेयो भवत्यन्येषां इति भावार्थः” सदाय वीतराग निर्विकल्प समाधिमां लीन साधुओने तो आत्मा उपादेय छे; मूढोने नहि. अहाहा..! शुं कहे छे? सांभळ, भाई! आत्मा जे शुद्धचैतन्यघन पूर्णानंदस्वरूप भगवान छे ते निर्विकल्प समाधिमां लीन एवा साधुओने सदाय उपादेय छे अने राग हेय छे.