समयसार गाथा ८४ ] [ १९७
तथा जे रागने उपादेय मानीने रागनी रुचिमां पडया छे तेमने आत्मा हेय छे. सूक्ष्म वात छे भाई! राग हेय छे एम तो आवे छे पण अहीं तो रागनी रुचिवाळाने आत्मा हेय छे एम कह्युुं छे.
आ अंतरना मार्गनी झीणी वात छे लोको राड नाखे पण शुं थाय? दय, दान, व्रत, भक्ति आदिनो राग विभावभाव छे. ते ते स्वभावथी विपरीत भिन्न चीज छे. ते विभावनो जे कर्ता थाय छे, तेनुं विभावनुं परिणमन नवा कर्मना बंधमां निमित्त थाय छे; त्यां अज्ञानी माने छे के नवां कर्म मे बांध्यां. तेवी ज रीते अज्ञानी जे हरख-शोक भोगवे छे तेमा कर्मनुं निमित्त छे त्यां अज्ञानी माने छे के हुं कर्म भोगवुं छुं. आ तेनी जूठी मान्यता छे.
अहीं बे द्रव्यो वच्चे भेदज्ञान कराववुं छे. रागनुं परिणमन अज्ञानी व्याप्यव्यापकपणे पोतामां पोते करे छे. राग मारुं व्याप्य कर्म अने रागनो हुं व्यापक कर्ता एम अज्ञानी माने तो ते वात अज्ञानपणे ठीक छे. अज्ञानी पोतानी चीजने भूलीने विकारनुं परिणमन व्याप्यव्यापकभावथी करे छे ए वात अज्ञानदशामां तो बराबर छे. परंतु तेनुं विकारी परिणमन नवा कर्मबंधमां निमित्त छे त्यां निमित्त देखीने में कर्म बांध्यां एवुं जे अज्ञानी माने छे ते विपरीत छे. हबखशोकना भोगना काळे कर्म एमां निमित्त छे. तेथी कर्म हुं भोगवुं छुं एम ते माने छे ए विपरीत छे.
अहीं तो परनो कर्ता जीव नथी एवुं भेदज्ञान करावीने कर्मबंधनना काळमां ज्ञानी (आत्मा) तेनुं निमित्त पण नथी ए वात सिद्ध कारवी छे. अहा! कर्मबंधनमां आत्मद्रव्य निमित्त नथी एवो एनो स्वाभव छे. समयसार गाथा १०प मां आवे छे के -‘ ‘आ लोकमां खरेखर आत्मा स्वभावथी पौद्गलिक कर्मने निमित्तभूत नहि होवा छतां पण, अनादि अज्ञानने लीधे पौद्गलकि कर्मने निमित्तरूप थतां एवा अज्ञानभावे परिणमतो होवाथी निमित्तभूत थतां, पौद्गलिक कर्म उत्पन्न थाय छे, तेथी ‘पौद्गलिक कर्म आत्माए कर्युं’ एवो निर्विकल्प विज्ञानघनस्वभावथी भ्रष्ट, विकल्पपरायण अज्ञानीओनो विकल्प छे; ते विकल्प उपचार ज छे, परमार्थ नथी.” अज्ञानी मानीले छे के हुं कर्मबंधननो कर्ता अने भोक्ता छुं खरेखर एम नथी. मात्र उपचारथी ज अज्ञानने कर्मबंधननो कर्ता कहेवामां आवे छे.
आत्मा स्वभावथी पौद्गलिक कर्मनुं निमित्त नथी. द्रव्य निमित्त केम होय? द्रव्य निमित्त नथी तो जेनी द्रष्टि द्रव्य उपर छे एवो ज्ञनी पण नवा कर्मबंधमां निमित्त नथी.
भगवान! वीतरागनो मार्ग बहुं सूक्ष्म छे. आ बहारनां रूपांळां शरीर वगेरेनां जे आकर्षण (रुचि) थाय छे ए बधो मिथ्यात्वभाव छे. अंदर पूर्णानंदनो नाथ परमात्मा त्रिकाळ सुंदर पडयो छे तेनुं आकर्षण (रुचि) छोडीने परवस्तुमां आकर्षण