१९८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
थई जाय छे ते अज्ञान छे. अज्ञानी आ बाह्य चीजोनी चमक देखीने तेनी अधिकतामां राजी थई जाय छे पण ए तो हाडकांना फोस्फरसनी चमक छे. अंदर त्रणलोकनो नाथ चैतन्यस्वरूप भगवान छे ते चमत्कारिक वस्तु छे. अहा! आवो शुद्ध चिदानंदस्वरूप भगवान ज्ञायक नवा कर्मबंधनमां निमित्त थाय एवो एनो स्वभाव नथी. जो स्वभावथी आत्मा निमित्त थाय तो आत्म विकारस्वरूप ज थई जाय. कमृबंधननुं उपादान तो कर्म जड छे अने एमां अज्ञानीनो अज्ञानभाव निमित्त छे, पण आत्मद्रव्य निमित्त नथी.
जुओ! आ तो भगवाननी (कहेली) धर्मकथा चाले छे. एमां लक्ष बीजे जाय तो वाणीनो अनादर थई जाय. एकभगवतारी ईन्द्रो जेने सांभळवा आवे छे एवी भगवाननी आ दिव्य वाणी छे. ते कोई महासौभाग्यथी सांभळवा मळे छे. नियमसार गाथा १०८मां आवे छे के -‘ ‘भगवान अर्हंतना मुखारविरंदथी नीकळेलो, (श्रवण माटे आवेल) सकळ जनताने श्रवणनुं सौभाग्य मळे एवो, सुंदर-आनंदस्यंदी (सुंदर-आनंद झरतो), अनक्षरात्मक जे दिव्यध्वनि, तेना परिज्ञानमां कुशळ चतुर्थज्ञानधर (मनःपर्ययज्ञानधारी) गौतममहर्षि ना मुखकमळथी नीकळेली जे चतुर वचनरचना, तेना गर्भमां रहेला रद्धांतादि (सिद्धांतादिा) समस्त शास्त्रोना अर्थसमूहना सास्सर्वस्वरूप शुद्ध-निश्चय-परम-आलोचनाना चार भेदो छे.”
भगवान मुखमांथी वाणी नीकळती नथी. सर्वांगेथी’ ध्वनि उठे छे; परंतु लोकोनी अपेक्षाए ‘मुखारविंदथी’ एम कह्युं छे. सकळ जनताने श्रवणनुं सौभाग्य मळे एवी आनंद झरती वाणी खरे छे. वाणीमां आनंदस्वरूप आत्मानुं निरूपण आवे छे एटले वाणीने आनंद देनारी कही छे. आ निमित्तनुं कथन छे. भगवाननी वाणीमां वीतरागता बतावी छे. वीतरागता कयारे प्रगटे? स्वनो आश्रय करे त्यारे, आनंदनी जे अनुवदशा प्रगटे छे ए जिनवाणीनो सार छे. आ दिव्य वाथी सांभळीने चार ज्ञानना धणी भगवान गणधरदेव सिद्धांतनी गूंथणी करे छे. आवी दिव्यध्वनि जेना काने पडे एनुं पण महा-सौभाग्य छे. ए दिव्यध्वनिनो सार आ पांच परमागमो अहीं उपर-नीचे कोतराई गयां छे. वहा, दिव्यध्वनि वाह!!
प्रश्नः– आ काळमां आपे पण आ सरस काम कर्युं छे! उत्तरः– कोण करे? छये द्रव्योमां, पर्यायनी उत्पत्तिनो काळ होय, ते ते पर्याय प्रगट थाय छे. ते पर्यायनी जन्मक्षण छे. प्रवचनसार गाथा १०२मांआव्युं छे के -द्रव्यनी जे पर्यायनी उत्पत्तिनो काळ होय ते पर्याय स्वकाळे पोताथी उत्पन्न थाय छे. तेनी पर्यायनी उत्पत्ति बीजो करी दे एम छे ज नहि. जन्मक्षण एटले पर्यायनी उत्पत्तिनो काळ होय त्यारे ते स्वतंत्र उत्पन्न थाय छे. आ परमागम-मंदिरना निर्माणनो एनो काळ हतो नथी तेथी तेना काळे ते थयुं छे, बीजाए कोईए कर्युं छे एम छे ज नहि. बीजाए कर्युं एम कहेवुं ए तो ते वखते निमित्त कोण हतुं एनुं ज्ञान करावे छे.