२१० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
घातीकर्मनो क्षय थतां कर्मरूप दशा अकर्मरूप थई ते कारणथी अहीं जीवने केवळज्ञान प्रगट थयुं छे एम नथी. चार ज्ञाननी पर्याय पलटीने केवळज्ञान थयुुं ते क्रिया छे. ते क्रिया परिणामस्वरूप होवाथी परिणामथी भिन्न नथी अने परिणाम एटले केवळज्ञान परिणामी एटले आत्माथी भिन्न नथी. तेथी केवळज्ञान आत्मानुं कार्य छे. घातीकर्मनो क्षय थयो के वज्रवृषभनाराच संहनन अने मनुष्यपर्याय हती माटे केवळज्ञान प्रगट थयुं एम छे ज नहि.
प्रश्नः– दिव्यध्वनिथी आ ज्ञान थयुं छे के नहि?
उत्तरः– ना, दिव्यध्वनिथी ज्ञान थयुं छे एम नथी. ज्ञान पोताथी थयुं छे. दिव्यध्वनिने वेद कहे छे. पंचास्तिकाय अने परमात्मप्रकाशमां तेने वेद कहेल छे. वेद अने शास्त्र बे शब्दो कह्या छे. वेदनो अर्थ दिव्यध्वनि कर्यो छे अने शास्त्रनो अर्थ महामुनिओनी वाणी करेलो छे. त्यां बे शब्दो लईने कह्युं छे के दिव्यध्वनिथी अने महामुनिओना शास्त्रथी ज्ञान थतुं नथी केमके ज्ञाननी अवस्था थई ते प्रथम न हती ते प्रगट थई छे. ते अवस्था पलटीने थई तेथी क्रिया छे. क्रिया परिणामस्वरूप होवाथी परिणामथी भिन्न नथी. अने ते परिणाम परिणामी द्रव्यथी भिन्न नथी. आम ज्ञान पोताथी थयुं छे, दिव्यध्वनिथी नहि. (दिव्यध्वनि तो पुद्गलनी पर्याय छे).
दर्शनपाहुडमां आवे छे के-हे सकर्णा! सम्यग्दर्शन विनानो जीव वंदन योग्य नथी. एटले जेनी श्रद्धामां भूल छे, अने हुं रागनो कर्ता छुं, देहादि परद्रव्यनी क्रिया करी शकुं छुं, देश, कुटुंब आदिने सुधारी शकुं छुं अने देशसेवा ए धर्म छे- एम जेनी मान्यता छे ते सम्यग्दर्शनथी रहित छे. आवा सम्यग्दर्शनथी रहित अज्ञानी वंदन करवा लायक नथी केमके ‘दंसणमूलोधम्मो’ धर्मनुं मूळ सम्यग्दर्शन छे. ‘चरितम् खलु धम्मो’ चारित्र साक्षात् धर्म छे, परंतु जेम मूळ विना वृक्ष होतुं नथी तेम सम्यग्दर्शन विना चारित्र होतुं नथी, तेथी कोईए द्रव्यलिंग धारण कर्युं होय अने पंचमहाव्रतादिनुं पालन करतो होय, परंतु पंचमहाव्रतनी क्रिया हुं करी शकुं छुं, ए मारुं कर्तव्य छे अने एनाथी मने लाभ (धर्म) छे एम जो ते मानतो होय तो ते सम्यग्दर्शन रहित मिथ्याद्रष्टि छे अने ते वंदन योग्य नथी एम भगवाने शिष्योने उपदेशमां कह्युं छे. बहु आकरी वात, भाई! पण आ यथार्थ अने सत्य वात छे.
सूत्रपाहुड गाथा १०मां कह्युं छे-‘ ‘वस्त्र रहित दिगंबर मुद्रास्वरूप अने पाणिपात्र एटले हाथरूपी पात्रमां ऊभा रहीने आहार करवो आवो एक अद्वितीय मोक्षमार्ग तीर्थंकर परमदेव जिनेन्द्रदेवे कह्यो छे. आ सिवाय बीजा बधा अमार्ग छे.” मोक्षमार्ग प्रकाशकना पांचमा अधिकारमां पंडितप्रवर श्री टोडरमलजीए दिगंबरमत सिवायना बीजा सर्वने अन्यमत कह्या छे. ते बधा उन्मार्ग छे. कोईना विरोध माटे आ वात नथी. वस्तुस्थिति ज आवी छे. सूत्रपाहुडनी २३मी गाथामां कह्युं छे के-“वस्त्र धारण