Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८प ] [ २११

करवावाळा सीझता नथी एटले के मोक्ष पामता नथी. तीर्थंकर भगवान पण ज्यां सुधी गृहस्थदशामां रहे त्यां सुधी मोक्ष पामता नथी. दीक्षा लईने दिगंबररूप धारण करे त्यारे मोक्ष पामे छे, केमके नग्नपणुं ते मोक्षमार्ग छे, शेष बधां लिंग उन्मार्ग छे.”

वस्त्रसहित मुनिपणुं माने तो एमां नवे तत्त्वनी भूल छे. मुनिनी भूमिकामां आस्रव मंद होय छे, परंतु वस्त्र राखवानो विकल्प तीव्र आस्रव छे. माटे एमां आस्रवनी भूल थई. मुनिनी भूमिकामां संवर उग्र होय छे तेने वस्त्र राखवानो भाव होतो नथी. छतां वस्त्र धारे तो ते संवरनी भूल छे. मुनिनी भूमिकामां कषाय घणो मंद होय छे. त्यां वस्त्रग्रहणनी सहेजे ईच्छा थती नथी. ते स्थितिमां घणी निर्जरा थाय छे. छतां वस्त्रसहितने घणी निर्जरा मानी ते निर्जरा तत्त्वनीभूल छे. छठ्ठा गुणस्थाने वस्त्र राखवानो तीव्र आस्रव जीवने होतो नथी छतां माने तो ते जीवतत्त्वनी भूल छे. छठ्ठा गुणस्थाने वस्त्र-पात्रनो संयोग होय नहि छतां वस्त्रसहित मुनिपणुं माने तो ते अजीवतत्त्वनी भूल छे. त्रण कषायना अभावपूर्वक छठ्ठुं गुणस्थान होय छे. त्यां मुनिने अंतर्बाह्य निर्ग्रंथता होय छे अने तेने वस्त्रग्रहणनी वृत्ति होती ज नथी. अहाहा..! जेने त्रण कषायनो अभाव छे तेवा साचा भावलिंगी मुनिने सदाय बहारमां वस्त्ररहित नग्न दिगंबर दशा ज निमित्तपणे होय छे.

तीर्थंकरदेवने पण वस्त्रसहित गृहस्थदशा होय त्यांसुधी मुनिपणुं नथी अने केवळज्ञान प्रगट थतुं नथी. कोई एम माने के पंचमहाव्रतने दिगंबरमां आस्रव कह्यो छे पण श्वेतांबरमां तेने निर्जरा कही छे तो ते एम पण नथी. तत्त्वार्थसूत्रमां पंचमहाव्रतने पुण्य कहेल छे. महाव्रत ए राग छे. ए धर्मनुं साधन नथी. रागथी बंध थाय छे, पण रागथी अंश पण निर्जरा थती नथी. पंचमहाव्रतने निर्जरानुं कारण कहेवुं ए तद्दन जूठी वात छे. अरे! लोकोए तत्त्वद्रष्टिनो विरोध करीने अन्यथा मान्युं छे ते कयां जशे? आवो अवसर मळ्‌यो अने तत्त्वथी विपरीत द्रष्टि राखीने सत्य न समजे एवा जीवो अरेरे! कयां रखडशे? आ शास्त्रनी गाथा ७४मां एम स्पष्ट कह्युं छे के शुभराग वर्तमानमां दुःखरूप छे अने भविष्यमां पण दुःखनुं कारण छे. त्यां एम केम कह्युं? कारण के शुभराग ते वर्तमान आकुळतारूप छे अने एनाथी जे पुण्य बंधाशे एना फळमां संयोग मळशे अने ते संयोग उपर लक्ष जतां दुःखस्वरूप एवो राग ज थशे.

प्रश्नः– परंतु मंद राग होय तो?

उत्तरः– भले मंदराग होय, ते वर्तमानमां दुःखरूप छे अने भविष्यमां दुःखना कारणरूप ज छे. पुण्यथी कदाचित् वीतरागदेव अने वीतरागनी वाणीनो संयोग मळे तो पण ए संयोगी चीज छे अने एना पर लक्ष जतां राग ज थशे. आ तो जेवुं वस्तुनुं स्वरूप छे तेवुं कहेवाय छे. अहीं कोई पक्षनी वात नथी. छहढालामां कह्युं छे के-

“यह राग-आग दहै सदा, तातैं समामृत सेईये”