२१२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
राग चाहे शुभ होय तोपण ते आग छे. माटे समतारूपी अमृतनुं सेवन करो. जन्म- मरणना अंतनो उपाय कोई अलौकिक छे. बापु! कोईने दुःख लागे तो लागे, पण मार्ग आ ज छे. दरेक वात बधाने सारी लागे एम केवी रीते बने? मोक्षमार्गप्रकाशकना पांचमा अधिकारमां कह्युं छे के-“एवो तो कोई उपदेश नथी के जे वडे सर्व जीवोने चेन थाय. वळी सत्य कहेतां विरोध ऊपजावे, पण विरोध तो परस्पर झघडो करतां थाय; पण अमे लडीए नहि तो तेओ पोतानी मेळे ज उपशांत थई जशे. अमने तो अमारा परिणामोनुं ज फळ थशे. मदिरानी निंदा करतां कलाल दुःख पामे, कुशीलनी निंदा करतां वेश्यादिक दुःख पामे तथा खरुं-खोटुं ओळखवानी परीक्षा बतावतां ठग दुःख पामे तो तेमां एम शुं करीए?”
अष्टपाहुडनी २३मी गाथा भावार्थमां कह्युं छे के-श्वेतांबर आदि वस्त्रधारकने पण मोक्ष थवानुं कहे छे ते मिथ्या छे, ते जिनमत नथी. अरे भाई! एक मिथ्यात्वना परिणाम छूटी बीजा मिथ्यात्वना परिणाम थया ते क्रिया छे. ते क्रिया परिणमनस्वरूप होवाथी परिणामथी भिन्न नथी अने ते परिणाम परिणामी आत्माथी भिन्न नथी. मिथ्यात्वना परिणामने पण आत्मा करे छे, दर्शनमोहकर्म नहि. अहीं तो परिणामने परथी भिन्न सिद्ध करवानी वात छे. परिणामथी परिणामी भिन्न छे ए वात अत्यारे अहीं नथी. अहीं तो द्विक्रियावादी मिथ्याद्रष्टिनी वात अहीं सिद्ध करवी छे. अहा! पोताना परिणामनी क्रिया पण आत्मा करे अने परनी क्रिया पण करे एम माननारा द्विक्रियावादी मिथ्याद्रष्टि छे. दयाना रागनी क्रिया पण करे अने परनी दया पण करे एम माननारा द्विक्रियावादी मिथ्याद्रष्टि छे. आवी वात सांभळनारा पण विरल होय छे योगसारमां आवे छे के-
संयोगद्रष्टिवाळाने लागे के अग्नि आवी तो पाणी गरम थयुं. वेलण फर्युं तो रोटली गोळ थई. पण स्वभावथी जुए तो एनो भ्रम मटी जाय. जुओ आटानी पर्याय बदलीने रोटली थई ते क्रिया छे. ते क्रिया परिणामस्वरूप होवाथी परिणामथी अभिन्न छे अने परिणाम परिणामी आटाथी अभिन्न छे. एमां वेलणे शुं कर्युं? कांई नहि. वेलणमां पण करवानी क्रिया पोतामां थई ते पोताना परिणामस्वरूप छे. ते क्रिया परिणामथी भिन्न नथी अने ते परिणाम (वेलणना) परमाणुओथी भिन्न नथी. तो बीजी चीजे एमां शुं कर्युं? कांई नहि; फक्त बीजी चीज एमां सहचरपणे निमित्त छे बस एटलुं.
माटे एम सिद्ध थयुं के ‘जे कोई क्रिया छे ते बधीय क्रियावानथी (द्रव्यथी) भिन्न नथी.’ अज्ञानीने एम लागे छे के पहेली अवस्था बदलीने बीजी थई ते परथी