२१६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
परमाणुथी अभिन्न छे; बाई तेने हाथ वडे फेरवे छे एम छे ज नहि. अहो! आवी वस्तुनी अबाधित मर्यादा छे!
कहे छेने के -क्रिया अने कर्तानुं अभिन्नपणुं सदाय तपी रह्युं छे एटले के सदाय प्रगट छे. माटे दरेक द्रव्यनी प्रत्येक पर्याय पोताथी थाय छे, परथी नहि एम सिद्ध थाय छे. निमित्तथी थाय ए वात बीलकुल साची नथी. घडानी पर्याय माटीथी थाय छे, कुंभारथी कदी नहि. वस्तु पोतानी पर्यायमां छे अने पर्यायनो कर्ता वस्तु पोते छे. द्रव्य अने पर्यायस्वरूप क्रियानुं अभिन्नपणुं सदाय प्रगट छे. अहाहा...! आ अक्षर जे लखाय छे ते पेन्सीलथी लखाय छे एम नथी; केमके अक्षरनी क्रिया अने पेन्सील भिन्न चीज छे. अक्षर लखाय ते (अक्षरना) परमाणुनी क्रिया छे अने ते, ते ते परमाणुथी अभिन्न छे. अक्षर लखाय छे तेनो कर्ता ते ते परमाणु छे, परंतु आंगळीथी के पेन्सीलथी ते अक्षरनी क्रिया थई छे एम बीलकुल नथी, गजब वात छे!
समयसारना छेल्ला कळशमां श्री अमृतचंद्रसूरि कहे छेके -‘ ‘पोतानी शक्तिथी जेमणे वस्तुनुं तत्त्व सारी रीते कह्युं छे एवा शब्दोए आ समयनी व्याख्या करी छे; स्वरूपगुप्त अमृतचंद्रसूरिनुं (तेमां) कांई ज कर्तव्य नथी.” अहाहा..! कहे छे के आ व्याख्या शब्दोए करी छे, में करी नथी. हुं तो मारा स्वरूपमां गुप्त छुं. भाषानी पर्यायथी शब्द परिणमे छे, तेने हुं (आत्मा) परिणमावी शकतो नथी.
वळी, प्रवचनसार कळश २१मां पण आचार्यदेव कहे छे- (खरेखर पुद्गलो ज स्वयं शब्दरूपे परिणमे छे, आत्मा तेमने परिणमावी शकतो नथी, तेम ज खरेखर सर्व पदार्थो ज स्वयं ज्ञेयपणे-प्रमेयपणे परिणमे छे, शब्दो तेमने ज्ञेय बनावी-समजावी शकता नथी माटे) “आत्मा सहित विश्व ते व्याख्येय छे, वाणीनी गूंथणी ते व्याख्या छे अने अमृतचंद्रसूरि ते व्याख्याता छे-एम मोहथी जनो न नाचो.” अहाहा...! में शब्द कर्या, अने शब्दथी तने ज्ञान थयुं एम मोह वडे मा फुलाओ; केमके ए मान्यता वस्तुस्वरूप नथी. आमां महापुरुषे पोतानी लघुता दर्शावी छे एटलुं ज नहि, वस्तुनी मर्यादा पण प्रगट करी छे. भाई! कोण व्याख्या करे? कोण भाषा करे? अने कोण समजावी शके? भाई! शब्द ते आत्मानुं कार्य नहि अने शब्द सांभळवाथी जीवने ज्ञान थयुं एम पण नहि.
ज्ञानना परिणमननी ते समये जे क्रिया थई ते क्रिया तारी छे. तारो आत्मा ते क्रियानो कर्ता छे, ते क्रियानो कर्ता वाणी नथी. वर्तमान प्रवचन सांभळतां जे ज्ञान थाय छे ते शब्दो सांभळवाथी थतुं नथी. भगवान! आमां कोई विवाद करो तो करो, पण वस्तुनी. मर्यादा ज आवी छे के वस्तुनी पलटवानी क्रिया (वस्तुथी) पोताथी थाय छे, परथी थती नथी. अहो! वस्तुस्वरूप खूब गंभीर छे! आ चश्मां आम ऊंचा थईने आंखे लागेलां छे.