समयसार गाथा ८प ] [ २१७
ते जीव करी शकतो नथी; आंगळीनुं पण ए कार्य नथी. तथा चश्मा छे तो जीव देखे-वांचे छे एम पण नथी. ज्ञाननी पर्याय ज्ञानथी (आत्माथी) थाय छे, परथी नहि. कह्युं ने के - शब्दोथी ज्ञान थाय छे एम मोहथी जनो न नाचो. शब्द काने पडया तो ज्ञान पर्याय थई एम छे ज नहि.
दर्शाव्युं छे. अभ्यंतर कारण ते निश्चय अने बाह्य निमित्तकारण ते व्यवहार- एम बेनुं प्रमाणज्ञान कराव्युं छे. प्रमाणज्ञानमां पण पर्याय पोताथी थाय छे एवा निश्चयने अंदर राखीने वात छे. कार्य अभ्यंतरकारणथी थाय छे ए वात राखीने त्यां बाह्य निमित्तनुं ज्ञान कराव्युं छे. निमित्तनुं ज्ञान कराववा बाह्य कारण कह्युं छे, पण निमित्त कार्यनुं वास्तविक कारण छे एम नथी. धवलना छठ्ठा भागमां स्पष्ट कह्युं छे के-अभ्यंतर कारणथी ज सर्व कार्य थाय छे. अंतरंग कारणथी कार्य थाय छे, बाह्य कारणथी नहि एवो त्यां पाठ छे.
भाई! वाणीथी के अन्य (शुभरागादि) निमित्तथी ज्ञान थाय छे एम नथी. ज्ञाननी पर्यायनो स्वपरप्रकाशक स्वभाव छे. तेथी स्वनो अनुभव थाय छे तेमां परनुं पण ज्ञान थाय छे, आवो ज्ञाननी पर्यायनो धर्म छे. अहाहा...! ज्ञाननी पर्यायमां स्वपरने प्रकाशवानुं सहज सामर्थ्य होवाथी पूर्णानंदनो नाथ चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मा पर्यायमां जाणवामां आवे छे. परंतु अज्ञानीनी द्रष्टि अंतर्मुख नथी. अनादिथी रागने वश पडेला अज्ञानीनुं लक्ष निज आत्मद्रव्य उपर जतुं नथी. एटले जे राग अने पर्यायने ते बहारमां जाणे छे ते राग अने पर्याय ज हुं छुं एम ते माने छे. आ वात समयसारनी गाथा १७-१८मां आवी गई छे. त्यां कह्युं छे के-
“आवो अनुभूतिस्वरूप भगवान आत्मा आबाळगोपाळ सौने सदाकाळ पोते ज अनुभवमां आवतो होवा छतां पण अनादि बंधना वशे पर (द्रव्यो) साथे एकपणाना निश्चयथी मूढ जे अज्ञानी तेने ‘आ अनुभूति छे ते ज हुं छुं’ एवुं आत्मज्ञान उदय थतुं नथी.” अहीं अनुभूतिस्वरूप आत्मा कह्यो ते त्रिकाळी ध्रुवनी वात छे. आवो आत्मा जेनुं स्वपरने प्रकाशवानुं सामर्थ्य छे एवा ज्ञाननी पर्यायमां आबाळगोपाळ सौने जाणवामां आवे छे. अज्ञानीनेे पण वर्तमान ज्ञाननी पर्यायमां पोतानुं द्रव्य अनुभववामां आवे छे. पण अज्ञानीनी त्यां द्रव्य उपर द्रष्टि नथी तेथी ते राग अने पर निमित्त के जेने ते जाणे छे ते हुं छुं एम भ्रमथी माने छे. आम अज्ञानीने द्रव्य द्रष्टि विना आत्मज्ञान उदय थतुं नथी.
अहो! आचार्योए शुं गजब काम कर्युं छे! केवळज्ञानने प्रसिद्ध करी दीधुं छे.