Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 990 of 4199

 

२१८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

कहे छे- भगवान! तारी एक समयनी ज्ञानपर्यायमां स्वपरप्रकाशक सामर्थ्य छे के नहि? अरे भाई! अज्ञानमां पण एक समयनी पर्यायमां स्वपरप्रकाशक स्वभाव छे. परप्रकाशक स्वभाव एकलो रहे एम कदी बनतुं नथी. दरेक समये दरेक पर्यायमां स्वपरप्रकाशक स्वभाव होवाथी ज्ञानमां अनुभूतिस्वरूप भगवान जाणवामां आवे छे. पण अज्ञानीनी त्यां द्रष्टि नथी. तेथी राग अने पर्यायने हुं जाणुं छुं एवो तेने भ्रम थाय छे. (खरेखर तो ते ज्ञानने ज जाणे छे).

जुओ, आत्मा राग-द्वेष आदि भाव करे छे ते ज समये कमनो बंध थाय छे. त्यां रागनी क्रिया जे थाय तेनी साथे आत्मा अभिन्न छे. माटे आत्मा रागनी क्रियानो तो कर्ता छे पण ते वखते कर्मबंधननी जे अवस्था थाय ते क्रियानो आत्मा कर्ता नथी. आत्मा जेम पोतानी विकारी पर्यायनो कर्ता छे तेम जो कर्मबंधनी पर्यायनो पण कर्ता थाय तो ते द्विक्रियावादी थई जाय. अर्थात् ते मिथ्याद्रष्टि थई जाय.

अहीं कह्युं छे के क्रिया अने क्रियावाननी अभिन्नता सदाय तपे छे, सदाय प्रगट छे. माटे आत्मानी जे पर्याय थाय छे तेमां आत्मा अभिन्न होवाथी तेनो ते कर्ता छे. खरेखर तो एम छे के आत्मामां जे पर्याय थाय छे ते संयोग छे, अने तेनो व्यय थाय ते वियोग छे. पोताना द्रव्यनी जे पर्याय थाय छे ते संयोग छे. त्रिकाळी स्वभावनी अपेक्षाए पर्यायने संयोग कहेवाय छे. वर्तमान पर्याय जे उत्पन्न थई ते संयोग अने व्यय पामी ते वियोग छे. उत्पाद ते संयोग अने व्यय ते वियोग छे. श्री पंचास्तिकायनी १८मी गाथामां आ वात लीधी छे. ज्यां पोतानी पर्यायना उत्पाद-व्ययने संयोग-वियोग कह्या त्यां पर चीजनी तो वात ज शुं? ए तो पर ज छे. अहीं कहे छे के -पोताना आत्मामां जे संयोगी पर्याय उत्पन्न थई तेनो अभिन्नपणे आत्मा कर्ता छे, पण ते समये संयोगी जे पुद्गलकर्म बंधायुं ते कर्मबंधनो कर्ता आत्मा नथी.

जीव जेवो मिथ्यात्व अने रागद्वेषना परिणाम करे छे ते प्रमाणे दर्शनमोह अने चारित्रमोहरूप जड कर्मनो बंध थाय छे. परंतु ते कर्मबंधनी क्रियानो आत्मा कर्ता नथी. क्रिया अने कर्तानुं अभिन्नपणुं सदाय तपतुं होवाथी दरेक आत्मानी अने परनी पर्याय ते ते समये पोतपोताथी उत्पन्न थाय छे, निमित्तथी नहि. जीवे राग कर्यो ते कर्मबंधनमां निमित्त छे, पण निमित्ते ते (कर्मबंधननी) क्रिया करी छे एम नथी.

समयसार गाथा १०पमां तो एम कह्युं छे के -आत्मा जे द्रव्य छे ते नवा कर्मबंधनमां निमित्त नथी. द्रव्यस्वभावनी जेने द्रष्टि थई छे तेने द्रव्य नवा कर्मबंधनमां निमित्त नथी, अर्थात् तेने नवां कर्म बंधाता नथी. परंतु द्रव्यद्रष्टिनो जेने अभाव छे अने जे पुण्य-पापना भावोनो कर्ता थाय छे ते अज्ञानीने राग-द्वेषना भाव कर्मबंधनमां निमित्त थाय छे. पण निमित्तथी कर्मबंधननी परिणति थाय छे एम कदीय नथी.