Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८प ] [ २१९

कर्ता अने क्रियानी अभिन्नता सदाय प्रगट होवाथी जीव व्याप्यव्यापकभावथी पोताना विकारी परिणामनो कर्ता छे, व्यापक नाम कर्ता द्रव्य अने व्याप्य नाम कर्म-विकारी पर्याय. जीव व्याप्यव्यापकभावथी विकारी परिणामनो कर्ता थाय छे. अने भाव्यभावकभावथी ते विकारी भावनो अनुभव करे छे. भाव्य एटले भोगववा लायक भाव अने आत्मा भावक नाम ते भावनो भोक्ता छे. आ अज्ञानीनी वात छे. तेम जो जीव व्याप्यव्यापकभावथी पुद्गलकर्मने करे तो ते बे क्रियानो कर्ता थई जाय. पोतानी पर्यायनुं कार्य आत्मा जेम व्यापक थईने करे तेम कर्मनी पर्यायनुं कार्य पण व्यापक थईने जीव करे तो ते बे क्रियानो कर्ता थई जाय छे. तो ते मिथ्याद्रष्टि छे केमके बे क्रिया करी शकतो नथी पण एवुं ते मिथ्या माने छे.

जीवने दयानो मंद भाव थाय तो तेना प्रमाणमां ते समये शातावेदनीय कर्म बंधाय. जो तीव्र दयानो भाव थाय तो तेना प्रमाणमां खूब शातावेदनीय कर्म बंधाय. त्यां जे दयाना परिणाम थया तेनो कर्ता आत्मा छे, पण शातावेदनीय कर्म जे बंधायुं तेनो आत्मा कर्ता नथी. जेटला प्रमाणमां जीव विकार करे तेटला प्रमाणमां कर्मनो बंध थाय, छतां कर्मबंधनी पर्यायनो कर्ता आत्मा नथी. तो पछी शरीर, मन, वाणी, खान-पान, धंधो-वेपार आदि परद्रव्यनी पर्यायनो कर्ता आत्मा थाय एम त्रणकाळमां नथी. हाथ पग हले, होठ हले, भाषा बोलाय, ईत्यादि जडनी क्रियानो कदीय आत्मा कर्ता नथी. आत्मा पोतानी रागनी पर्यायने करे अने जडनी पर्यायने पण करे एम कदापि होई शके नहि. बहु सूक्ष्म वात छे, भाई!

पांच वात मुख्यपणे समजवा जेवी छे- उपादान, निमित्त, निश्चय, व्यवहार अने क्रमबद्ध- आ पांचनी खूब चर्चा चाले छे. दिगंबर संतोए जगत समक्ष सत्य जाहेर कर्युं छे. कहे छे-आत्मा (अज्ञानी) रागनो कर्ता अने हरख-शोकनो भोक्ता छे पण जडकर्मनो कर्ता- भोक्ता आत्मा कदीय नथी. तत्त्वार्थसूत्रमां ‘विपाको अनुभवः’ एम जे कह्युं छे ए निमित्तनुं व्यवहारनयथी कथन छे. एवुं ज जो श्रद्धान करे तो ते मिथ्यात्व छे. जीव व्याप्यव्यापकभावथी पुद्गलकर्मने करे वा भाव्यभावकभावथी पुद्गलकर्मने भोगवे तो ते जीवने पोतानी अने परनी भेगी मळेली बे क्रियाथी अभिन्नपणानो प्रसंग आवतां स्वपरनो विभाग अस्त थई जाय छे. बे क्रियानो कर्ता थाय तो पोतानी पर्याय अने परनी पर्याय (भिन्नता) अस्त थई जाय छे. तेथी तेने मिथ्यादर्शन ज थाय छे.

अरे भाई! आ वात समजवी पडशे. रोटली, दाळ, भात, चटणी आदि खावानी ईच्छा थई त्यां ईच्छानो कर्ता आत्मा छे पण रोटली, दाळ, भात, चटणी खावानी जे क्रिया थई तेनो कर्ता आत्मा नथी. ए जडनी क्रिया छे ए ते में करी एम जे माने छे ते द्विक्रियावादी मिथ्याद्रष्टि छे.