२२० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
छे. ते ज्ञाननी हीणी अवस्थामां निमित्त छे. परंतु ज्ञाननी हीणी अवस्था जड कर्मने लईने थई छे एम नथी. शास्त्रमां तो निमित्तनुं व्यवहारनयथी कथन होय छे. निमित्तथी कार्य थाय एवो चिरकाळनो जीवोने अभ्यास छे एटले आ वात बेसवी कठण पडे छे. पण भाई! शास्त्रमां जे अपेक्षाथी कथन होय छे ते यथार्थ समजवुं जोईए. ज्ञाननी हीनाधिक अवस्था पोतानी पर्यायनी योग्यताथी थाय छे; तेमां ज्ञानावरणीय कर्मनुं कांई कर्तव्य नथी, मात्र निमित्तपणे होय छे ए ज. एवी रीते वीर्यांतरायनो उदय छे माटे आत्मामां वीर्यनी हीणी दशा थइ छे एम नथी. वीर्यांतरायनो उदय एमां कांई करतो नथी.
आ वात चालती नथी एटले लोकोने नवी लागे छे. पण भाई! आ तो भगवानना श्रीमुखेथी नीकळेली सत्य वात छे. कर्मनो उदय जडनी पर्याय छे. ते आत्मानी (हीणी) अवस्थाने केम करे? जीवनी पर्याय कर्मने अडती नथी अने कर्म जीवनी पर्यायने अडतुं नथी. आ वस्तुस्थिति छे.
ज्ञानीने जे विकल्प थाय तेनो ते जाणनार छे. ज्ञानी जाणवानी क्रिया करे अने रागनी क्रिया पण करे-एम नथी. तेवी रीते अज्ञानी रागनी क्रिया करे अने परनी पण क्रिया करे एम नथी. आ घणी गंभीर अने सूक्ष्म वात छे. आ जे समजे नहि तेने मूळमां ज भूल छे. कह्युं छे ने के-‘योग्यता हि शरणम्’ प्रत्येक द्रव्यनी प्रत्येक पर्याय तेनी योग्यताथी थाय छे; परथी नहि. परंतु परथी थाय एम माने तो स्व-परनी क्रियाने अभिन्न माननार तेना मतमां स्व-परनो विभाग नष्ट थई जाय छे, अर्थात् तेनी मान्यतामां स्व-परनुं एकपणुं थई जाय छे. पोतानी पर्यायने करे अने परनी पर्यायने पणकरे एवुं माननार मिथ्याद्रष्टि छे अने ते सर्वज्ञना मतनी बहार छे. कोईने लागे के आ तो एकांत छे. पण भाई! आ सम्यक् एकांत छे. जीव पोतानी पर्यायनो कर्ता छे अने परनी पर्यायनो कर्ता नथी एम सम्यक् एकांत थाय त्यारे साथे निमित्तनुं ज्ञान थाय तेने साचुं अनेकांत कहे छे. निमित्त छे, बस. परंतु निमित्तथी थाय छे एम नथी.
गोम्मटसारमां आवे छे के- ज्ञानावरणीयथी ज्ञान रोकाय, वीर्यांतरायना उदयथी वीर्य रोकाय, दर्शनमोहना उदयथी मिथ्यात्व थाय, चारित्रमोहना उदयथी रागद्वेष थाय, आयुना उदये अमुक काळ देहमां रहेवुं पडे ईत्यादि. भाई! आ तो बधां व्यवहारनयनां कथन छे. आत्मा पोतानी योग्यताथी विकारपणे परिणमे छे, परना कारणे ते ते पर्यायो थाय छे एम नथी.