समयसार गाथा ८प ] [ २२१
शातावेदनीय कर्म निमित्त छे. लक्ष्मी आवे, शरीर निरोगी रहे ईत्यादि ते ते पर्यायनुं पोतानुं कार्य छे, निमित्तथी ते कार्य थयुं छे एम नथी. पूजननी जयमालामां आवे छे ने-
कर्म बिचारां जड छे; कर्मने लईने जीवने विकार थतो नथी. पोतानी भूलने लईने जीवमां विकार स्वतंत्र पोताथी थाय छे.
तो- कर्मे राजा, कर्मे रंक;
भाई! ए बधां निमित्तनी मुख्यताथी कथन छे. राजा के रंकनी पोतानी पर्याय पोताथी थाय छे; कर्मथी नहि. जुओ, रामचंद्रजी वनवास गया. त्यां सीताजीनुं हरण थयुं. त्यारे सीताजीने शोधवा नीकळ्या. पत्थर अने पहाडने रामचंद्रजी पूछे छेः- सीताजीने कयांय जोयां? आ पोतानी पर्यायनो दोष छे, कर्मने लईने नहि. अने पछी विकल्प छूटी गयो ते कर्मना उदयना अभावथी नहि पण पोते निर्विकल्पस्वरूपमां स्थिर थतां विकल्प छूटी गयो छे.
रावण सीताजीनुं हरण करीने विमानमां लई जाय छे त्यारे रस्तामां सीताजी पोतानुं झांझर फेंकी दे छे. ते झांझर लावीने लक्ष्मणजीने बतावीने पूछयुं-शुं आ झांझर सीताजीनुं छे? त्यारे लक्ष्मणे कह्युं-हुं सीतामाताने पगे लागवा जतो त्यारे नीची नजरे पगमां आ झांझर जोयेलुं. ऊंची नजर करीने सीताजी सामे कदी में जोयुं नथी. अहा! जुओ, आ सज्जनता अने नैतिकता! लक्ष्मण त्रण खंडना धणी वासुदेव हता. तेओ सज्जनता अने नैतिकतानी मूर्ति हता. लक्ष्मणजी जंगलमां रामचंद्रजीनी अनेक प्रकारे सेवा करता. रामचंद्रजी बळभद्र हता. लक्ष्मणजी तेमनी सेवा करता एम कहेवुं ए तो व्यवहारनुं कथन छे. सेवानो विकल्प आव्यो माटे बहारनी क्रिया थई एम नथी. तथापि कोई पोतानी क्रिया अने परनी क्रिया-एम बे क्रिया आत्मा करे एवुं माने तो ते द्विक्रियावादी मिथ्याद्रष्टि छे अने तेथी ते सर्वज्ञना मतनी बहार छे. कर्मे ज्ञान रोकी दीधुं अने कर्मनो कर्ता अने भोक्ता जीव छे एवुं माननार मिथ्याद्रष्टि छे अने जिनवरनी आज्ञाथी बहार छे.
अहीं तो आत्मानी वात करी छे. पंचास्तिकायमां कह्युं छे के-एक रजकण पोतानी क्रिया करे अने बीजा रजकणनी पण क्रिया करे एम त्रणकाळमां बनतुं नथी. आ तो