२२२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
मूळ सिद्धांत छे अने ते छ ए द्रव्योमां लागु पडे छे. एक द्रव्यनी पर्याय अन्यद्रव्यनी पर्यायने करे नहि ए सिद्धांत द्रव्योनी प्रत्येक पर्यायमां लागु पडे छे. एम न माने ते द्विक्रियावादी मिथ्याद्रष्टि छे. श्री कुंदकुंदाचार्य कहे छे के ते ‘सो जिणावमदम्’ जिनआज्ञाथी बहार छे.
परनी दयानो भाव जीव करे अने परनी दया पण पाळी शके एम माननार जिनवरना मतथी बहार छे. आ वात न समजाय एटले एनो विरोध करे पण खरेखर तो ते पोतानो विरोध करे छे. वळी परनी दयानो जे शुभराग छे ते पण हिंसा छे. पुरुषार्थसिद्धयुपायमां (छंद ४४मां) कह्युं छे के जे भावे तीर्थंकरनामकर्म बंधाय ते भाव हिंसा छे, अपराध छे; केमके बंधन अपराधथी थाय छे. निरपराधथी बंधन न थाय. बंधन थाय ते भाव अपराध छे. अहीं तो विशेष कहे छे के परनी दया हुं पाळी शकुं ए मान्यता मिथ्यादर्शन छे. महाअपराध छे. गजब वात छे!
सोलहकारणभावनाथी तीर्थंकरगोत्र बंधाय छे. ते सोळे प्रकारना भाव राग छे, अपराध छे, गुन्हो छे. अज्ञानीने तीर्थंकर प्रकृतिना बंधना कारणरूप राग होतो ज नथी. ज्ञानीने ते राग आवे छे तेने ते जाणे छे. जेने स्वभाव तरफ झुकाव थयो छे. ते ज्ञानीने अल्प राग बाकी छे तो विकल्प आवतां तीर्थंकरगोत्र बंधाय छे. परंतु ते विकल्प तोडीने अल्पकाळमां मोक्ष जाय छे. त्यां तीर्थंकरप्रकृति बांधी, वा तेवो राग हतो ते कारणे मोक्ष थाय छे एम नथी. भाई! अज्ञानीना मतमां वाते वाते फेर छे. कह्युं छे ने के-
भगवान सर्वज्ञदेव अने संतो कहे छे के-भाई! अमारी श्रद्धामां अने तारी (अज्ञानीनी) श्रद्धामां वाते वाते फेर छे. अहीं भगवान कुंदकुंदाचार्यदेव फरमावे छे के -कोई एम माने के जीव पोताना रागनी क्रिया पण करे अने परनी क्रिया पण करे तो एम माननार सर्वज्ञनी आज्ञाथी बहार छे. तेने जैनमतनी श्रद्धा नथी. परनी दया पाळी शकुं, परने जीवाडी शकुं, परने उपदेश दई ज्ञान पमाडी शकुं-एवुं माननार जिनआज्ञाथी बहार छे. बंध अधिकारमां त्यां सुधी वात करी छे के-हुं बीजाने मोक्ष पमाडी दउं एम तुं माने छे तो शुं तेनी वीतराग परिणति विना तुं एने मोक्ष पमाडी दईश? अने तेने वीतराग परिणति होय तो तेनो मोक्ष थशे एमां शुं तें एनी वीतराग परिणति करी छे? एम नथी. भाई! हुं बीजाने बंध करावुं वा मोक्ष पमाडी दउं एम तुं माने ते बधां मिथ्याद्रष्टिनां लक्षण छे.
कोई एम कहे के जो उपदेशथी बीजाने ज्ञान पमाडी शकातुं नथी तो शा माटे