Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८प ] [ २२३

तेने उपदेश आपी समजावो छो? अरे प्रभु! सांभळ, धीरजथी सांभळ. वाणी वाणीना काळे निकळे छे अने (उपदेशना) विकल्पना काळे विकल्प थाय छे. बन्ने समकाळे छे. पण स्वतंत्र छे. आत्मा तो तेनो जाणनार छे. उपदेशनी वाणीनो आत्मा कर्ता नथी अने वाणी ज्ञाननी पर्यायनो कर्ता नथी. भाषानी पर्याय तो परनी जडनी छे. तेने आत्मा केम करे? अने ते आत्माना ज्ञानने केम करे? द्रव्य पोतानुं कार्य करे अने परनुं पण कार्य करे एम माने ते मिथ्याद्रष्टि छे, जिनआज्ञाथी बहार छे.

प्रवचनसारना छेल्ला २२मा श्लोकमां एम कह्युं छे के - “आ रीते (आ परमागममां) अमंदपणे (जोरथी, बळवानपणे, मोटे अवाजे) जे थोडु घणुं तत्त्व कहेवामां आव्युं, ते बधुं चैतन्यने विषे खरेखर अग्निमां होमायेली वस्तु समान (स्वाहा) थई गयुं” भाई! समजनार पोताना कारणे समजे छे; वाणी तो तेमां निमित्तमात्र छे. वाणीना कारणे ज्ञान थाय छे एम नथी. लोकोने अटपटुं लागे, पण शुं थाय? वस्तुनुं स्वरूप ज आवुं छे. द्रव्य पोतानी पर्यायने करे अने अन्यद्रव्यनी पर्यायने पण करे एम त्रणकाळमां नथी.

कोई श्रावक हो के साधु हो, पण जो ते एम माने के हुं दयानो भाव पण करुं छुुं अने पर जीवोनी दया पण पाळुं छुं तो ते बे (द्रव्योनी) क्रियानो कर्ता थयो अने तेथी ते मिथ्याद्रष्टि छे. “जीवो अने जीववा दो” ए वीतरागनी वाणी नथी. ए तो अज्ञानीनुं वचन छे. भगवान तो कहे छे के तारा दयाना भावथी बीजो जीव जीवे, सुखी-दुःखी थाय एम त्रणकाळमां नथी. ते पोताना आयुष्यनी स्थितिथी जीवे छे; तुं एने जीवाडी शकतो नथी. बंध अधिकारमां आवे छे के-हुं परने मारुं अने जीवाडुं एम माननार मिथ्याद्रष्टि छे, जिनआज्ञाथी बहार छे. परनी हिंसा जीव करी शकतो नथी. भाव आवे छे तेनो ते कर्ता छे, पण परनी साथे एने संबंध नथी. पुरुषार्थसिद्धयुपायमां कह्युं छे के-रागनो भाव थाय ते हिंसा छे. शुभरागनो भाव पण आत्मानी हिंसा करनारो छे. पंचमहाव्रतना परिणामनो राग धर्मात्माने आवे, पण ते आस्रव छे, हिंसा छे. तत्त्वार्थसूत्रमां शुभरागने आस्रव कह्यो छे. आम रागादि परिणाम ते हिंसा छे, परनी दया के हिंसा तो आत्मा करी शकतो नथी.

* गाथा ८पः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘बे द्रव्योनी क्रिया भिन्न ज छे. जडनी क्रिया चेतन करतुं नथी, चेतननी क्रिया जड करतुं नथी. जे पुरुष एक द्रव्यने बे क्रिया करतुं माने ते मिथ्याद्रष्टि छे, कारण के बे द्रव्यनी क्रिया एक द्रव्य करे छे एम मानवुं ते जिननो मत नथी.’

जगतमां जीव अनंत छे अने जड पुद्गलो अनंतानंत छे. एमां प्रत्येक पदार्थनी परिणतिनी क्रिया प्रत्येक समये भिन्न भिन्न छे. कोई द्रव्यनी क्रिया कोई बीजो करी