Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२२४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

शके ए वात त्रणकाळमां संभवित नथी. बीजानुं जीवन ते परद्रव्यनी क्रिया छे. ते पोताना आयुनी स्थितिथी जीवे छे, आयुना क्षयथी मरे छे. माटे बीजो बीजाने जीवाडे, वा बीजानी दया पाळे एम छे ज नहि. तेवी रीते आत्मा भाषा-सत्य के जूठ बोली शके एम छे ज नहि. आत्मा पोतानी पर्यायने करे, पण ते परनी पर्यायने केम करी शके? सूक्ष्म वात, भाइ! आत्मा जाणे, पण भाषाने करे एम छे ज नहि. भाषामां स्वपरने कहेवानी स्वतः ताकात छे अने आत्मामां स्वपरने जाणवानी स्वतः ताकात छे.

भाषामां स्वपरनुं कथन करवानी शक्ति स्वतः पोताथी छे, आत्माना कारणे नहि. अरे भाई! आ उपदेश सांभळवामां वचननी क्रिया भिन्न छे अने अंदर आत्मानी ज्ञाननी क्रिया भिन्न छे. बोधपाहुडनी ६१मी गाथामां आवे छे के-“शब्दना विकारथी उत्पन्न अक्षररूप परिणमेल भाषासूत्रोमां जिनदेवे कह्युं, ते श्रवणमां अक्षररूप आव्युं अने जे रीते जिनदेवे कह्युं ते रीते परंपराथी भद्रबाहु नामना पांचमा श्रुतकेवलीए जाण्युं...”

अरे भाई! भाषानी पर्यायने भगवान पण करी शकता नथी. दिव्यध्वनि छूटे छे ए तो शब्दनो विकार छे. तेना काळे ते वाणी छूटे छे, केवळीने लईने वाणी छूटती नथी; केमके बे द्रव्योनी क्रिया भिन्न भिन्न छे. भाषानी क्रिया-शब्दनो विकार भिन्न छे अने ज्ञाननी क्रिया-आत्मानी परिणति भिन्न छे. माटे ज्ञाननी परिणतिथी शब्दना विकाररूप भाषानी परिणति थई ए वात त्रणकाळमां नथी. भाषा कोण बोले? शुं आत्मा बोले? अरे! बोले ते बीजो, आत्मा नहि. कुंदकुंदाचार्यदेवे कह्युं ने के -भाषा शब्दना विकारथी बनी छे. अमाराथी नहि, केवळीथी नहि, संतोथी नहि. तेने निमित्तनी अपेक्षा नथी. श्री अमृतचंद्रदेवे प्रवचनसारनी टीका पूरी करतां छेल्ले कह्युं ने के-आ शास्त्र में बनाव्युं छे एवा मोहथी जनो न नाचो; अने एनाथी (शब्दोथी) तमने ज्ञान थाय छे एम मोहथी न नाचो. आ तो अबाधित सिद्धांत छे के एक द्रव्य बे (द्रव्योनी) क्रिया करी शके ज नहि; अन्यथा बधुं एक थई जाय-जे सर्वज्ञनी आज्ञाथी बहार छे. जे बहु-क्रियावादी छे ते मिथ्याद्रष्टि छे.

अहीं कहे छे के जडनी क्रियाने चेतन करतुं नथी. भाषानी क्रियाने आत्मा करतो नथी. तेम जडकर्मनो उदय पोतानी पर्यायने करे जीवना रागने पण करे एम बनतुं नथी. अरे! बे तत्त्व भिन्न भिन्न छे, तेनी पर्याय पण भिन्न भिन्न छे. दरेक द्रव्य पोतानी क्रिया करवा समर्थ छे अने पर माटे ते पांगळुं छे.

अजीव अधिकारमां कळश ४३मां कह्युं छे के -आ अविवेकना नाटकमां पुद्गल नाचे छे तो नाचो, हुं तो आत्मा ज्ञायकस्वरूप छुं. अहाहा...! भगवान आत्मा चैतन्यसूर्य जाणगस्वभावना नूरनुं पूर छे. ते भाषाने केम करे? शरीरने ते केम चलावे?