समयसार गाथा ८प ] [ २२प
भाई! पूजा वखते जे ‘स्वाहा, स्वाहा’ इत्यादि बोलाय छे ते आत्मानी क्रिया नथी. हाथ ऊंचोनीचो थाय ते आत्मानुं कार्य नथी.
दरेक तत्त्व भिन्न भिन्न छे वेदांतनी जेम बधुं एक नथी. प्रवचनसारमां १७२मी गाथाना अलिंगग्रहणना १पमा बोलमां कह्युं छे के- “लिंग वडे एटले के अमेहनाकार वडे जेनुं ग्रहण एटले के लोकमां व्यापवापणुं नथी ते अलिंगग्रहण छे; आ रीते आत्मा पाखंडीओने प्रसिद्ध साधनरूप आकारवाळो-लोकव्याप्तिवाळो नथी एवा अर्थनी प्राप्ति थाय छे.” बधा मळीने एक आत्मा छे एवो पाखंडीओनो प्रसिद्ध मत छे. ए मान्यता अज्ञानीनी छे. कोई कहे के आ निश्चयनी वात वेदांत जेवी लागे छे तो तेना अहीं निषेध करे छे. आत्मा सर्वव्यापक छे एम माननारनी वात साची नथी. बधा आत्माओ जाति अपेक्षाए समान छे. पण बधा मळीने एक आत्मा नथी.
अहीं कहे छे के जडनी क्रियाने चेतन करतुं नथी अने चेतननी रागद्वेषनी क्रिया के ज्ञाननी क्रियाने कर्मनो उदय करतो नथी. जे पुरुष एक द्रव्यने बे क्रियानो कर्ता माने छे ते जैन नथी, मिथ्याद्रष्टि छे. घातीकर्मोनो अरिहंत भगवाने नाश कर्यो अने ज्ञानावरणीय कर्म ज्ञाननो घात करे छे ईत्यादि कथन निमित्तनां व्यवहारनयनां छे. वस्तुस्वरूप तेम नथी. परद्रव्य शुं ज्ञानना घातनी क्रिया करी शके? आत्मा शुं कर्मनो नाश करी शके? ना; बीलकुल नहि.
प्रवचनसार गाथा १६नी टीकामां घातीकर्मना बे प्रकार कह्या छे-द्रव्यघाती अने भावघाती. पोतानी पर्याय ते भावघाती छे अने द्रव्यघाती तो निमित्त छे. भावघाती (कर्म) पर्यायनो घात करे छे त्यारे कर्मबंधन थाय छे. ते जडकर्मनी अवस्था आत्मा करतो नथी. केवळज्ञान थाय त्यारे जीव घातीकर्मोनो नाश करे छे ए वात यथार्थ नथी. जीव केवळज्ञाननी क्रिया करे अने घातीकर्मोना नाशनी पण क्रिया करे तो बे क्रियानो कर्ता थई जाय. पण एम छे नहि. भाई आ अति गंभीर अने सूक्ष्म वात छे.
बापु! हुं शुं करी शकुं अने शुं ना करी शकुं एनी पण जेने खबर नथी तेने आत्म- अनुभव केम थाय? अहीं तो अति स्पष्ट कहे छे के बे भिन्न द्रव्योनी क्रियानुं कर्ता एक द्रव्यने माने ते भगवान जिनेन्द्रदेवना मतथी बहार छे; तेने सम्यग्दर्शन नथी. दुकानना थडे बेसीने मनमां अभिमान करे के में वेपार-धंधानो राग पण कर्यो अने दुकानना वेपारनी बाह्य प्रवृत्ति पण करी तो ते मिथ्याद्रष्टि छे.
गौतम गणधर पधार्या तो भगवाननी दिव्यध्वनि छूटी एम छे ज नहि. गौतम भगवानने ईन्द्रे पहेलां उपस्थित केम न कर्या? त्यां कह्युं के काळलब्धि विना ईन्द्र तेमने लाववा समर्थ नथी. स्वामीकार्तिकेयानुप्रेक्षा २२०० वर्ष पुराणो ग्रंथ छे. समयसारथी पण पहेलांनो जूनो ग्रंथ छे. छये द्रव्यो जे अनंत छे ते प्रत्येकनी समय समयनी जे