समयसार गाथा ८प ] [ २२७
छे ते प्रमाणे थशे ए वात तो पछी, जगतमां केवळज्ञाननी सत्तानो तने स्वीकार छे? प्रभु! ए सत्तानो स्वसन्मुख थईने स्वीकार नथी त्यां सुधी केवळीए जोयुं तेम भव घटशे ए वात ज रहेती नथी. भगवान त्रणकाळ त्रणलोकने जाणे छे ए तो व्यवहारनुं कथन छे. खरेखर तो ते पोतानी पर्यायने जाणे छे जेमां त्रणकाळ त्रणलोक जणाय छे.
जे एक समयनी पर्यायमां त्रणकाळ त्रणलोक प्रतिभासे, जेमां अनंता केवळी जणाय ते पर्यायनुं सामर्थ्य केटलुं? आवा अनंत अनंत सामर्थ्ययुक्त केवळज्ञाननो जेणे स्वीकार कर्यो ते पर्याय अल्पज्ञ छे अने सर्वज्ञ छे ते पर छे. केवळज्ञाननो स्वीकार अल्पज्ञ पर्याय के पर सर्वज्ञनी सामुं जोवाथी थतो नथी. तो तेनी सत्तानो स्वीकार केवी रीते थाय? के ज्यारे शुद्ध चैतन्यस्वभावमय निज ज्ञायकस्वभावनी सन्मुख थई तेनी द्रष्टि थाय त्यारे तेनो यथार्थ स्वीकार थाय छे अने ते अनंतो पुरुषार्थ छे. अहाहा...! केवळज्ञाननी पर्याय जेने पोताना ज्ञानमां बेठी तेनी द्रष्टि स्वभावसन्मुख होय छे. प्रवचनसारनी गाथा ८०मां कह्युं छे के-जे अरिहंतने द्रव्य, गुण अने पर्यायथी जाणे छे तेने आत्मानी सन्मुख लक्ष थईने मोहनो क्षय थाय छे.
अहाहा...! जे पर्यायमां त्रिकाळवर्ती अनंता सिद्धो अने केवळीओ प्रत्यक्ष जणाय ए केवळज्ञाननी परम अद्भुत ताकात छे. एनी शुं वात! तेनो स्वीकार करतां द्रष्टि द्रव्य उपर जाय छे अने तेमां स्वभावसन्मुखतानो अनंत पुरुषार्थ आवी जाय छे. त्यां एक समयमां पांचेय समवाय-स्वभाव, नियत, काळ, पुरुषार्थ अने निमित्त-एम पांचेय समवाय होय ज छे. कार्यसिद्धिमां पांचेय समवाय होय छे.
गजसुकुमार भगवान पासे वाणी सांभळवा गयेला. हाथीना ताळवा जेवुं एमनुं कोमळ शरीर हतुं. भगवाननी वाणी सांभळीने बोल्या-‘प्रभु! हुं दीक्षा अंगीकार करवा मागुं छुं.’ दीक्षा धारण करीने द्वारिकाना स्मशानमां ध्यान करवा लाग्या. त्यां जे कन्या साथे सगपण थयेलुं तेनो पिता आवी उपसर्ग करवा लाग्यो. माथा उपर माटीनी पाळ करी अंदर धगधगता अंगारा भर्या. मुनिराज स्वरूपना ध्यानमां एटला लीन थई गया के उपसर्ग टळीने त्यां केवळज्ञान पामी मोक्ष पधार्या. जुओ पुरुषार्थनी गति! भगवाननी वाणीमां पुरुषार्थनी वात आवी छे. पुरुषार्थहीनतानी वात करे ते भगवाननो मार्ग नथी. अहीं पण कहे छे के एक द्रव्य बे द्रव्योनी क्रियाने करे ए मान्यता भगवाननो मार्ग नथी. ए तो सर्वज्ञनी आज्ञाथी बहार छे.
एक परमाणु बीजा परमाणुनुं कार्य न करे, केमके बे द्रव्य वच्चे अत्यंताभाव छे. एक परमाणु बीजा परमाणुने स्पर्शतोय नथी. शास्त्रमां आवे छे के चार गुण चिकाशवाळो परमाणु छ गुण चिकाशवाळा साथे भळे तो ते बदलीने छ गुण चिकाश