सुत्तं जिणोवदिट्ठं पोग्गलदव्वप्पगेहिं वयणेहिं ।
पूर्वोक्तलक्षणस्यात्मनो भावश्रुतज्ञानेन स्वसंवेदनान्निश्चयश्रुतकेवली भवतीति । किंच --यथा कोऽपि देवदत्त आदित्योदयेन दिवसे पश्यति, रात्रौ किमपि प्रदीपेनेति । तथादित्योदयस्थानीयेन केवलज्ञानेन दिवसस्थानीयमोक्षपर्याये भगवानात्मानं पश्यति, संसारी विवेकिजनः पुनर्निशास्थानीयसंसारपर्याये
भावार्थः — भगवान समस्त पदार्थोने जाणे छे तेथी कांई तेओ ‘केवळी’ कहेवाता नथी, परंतु केवळ अर्थात् शुद्ध आत्माने जाणता – अनुभवता होवाथी तेओ ‘केवळी’ कहेवाय छे. केवळ ( – शुद्ध) आत्माने जाणनार – अनुभवनार श्रुतज्ञानी पण ‘श्रुतकेवळी’ कहेवाय छे. केवळी अने श्रुतकेवळीमां तफावत एटलो छे के — केवळी जेमां चैतन्यना समस्त विशेषो एकीसाथे परिणमे छे एवा केवळज्ञान वडे केवळ आत्माने अनुभवे छे अने श्रुतकेवळी जेमां चैतन्यना केटलाक विशेषो क्रमे परिणमे छे एवा श्रुतज्ञान वडे केवळ आत्माने अनुभवे छे; अर्थात्, केवळी सूर्यसमान केवळज्ञान वडे आत्माने देखे – अनुभवे छे अने श्रुतकेवळी दीवा समान श्रुतज्ञान वडे आत्माने देखे – अनुभवे छे. आ रीते केवळीमां ने श्रुतकेवळीमां स्वरूपस्थिरतानी तरतमतारूप भेद ज मुख्य छे, वत्तुंओछुं (वधारे – ओछा पदार्थो) जाणवारूप भेद अत्यंत गौण छे. माटे घणुं जाणवानी इच्छारूप क्षोभ छोडी स्वरूपमां ज निश्चळ रहेवुं योग्य छे. ए ज केवळज्ञान -प्राप्तिनो उपाय छे. ३३.
हवे, ज्ञानना श्रुत -उपाधिकृत भेदने दूर करे छे (अर्थात् श्रुतज्ञान पण ज्ञान ज छे, श्रुतरूप उपाधिने कारणे ज्ञानमां कांई भेद पडतो नथी एम दर्शावे छे)ः —
अन्वयार्थः — [सूत्रं] सूत्र एटले [पुद्गलद्रव्यात्मकैः वचनैः] पुद्गलद्रव्यात्मक वचनो वडे [जिनोपदिष्टं] जिनभगवंते उपदेशेलुं ते. [तज्ज्ञप्तिः हि] तेनी ज्ञप्ति ते [ज्ञानं] ज्ञान छे [च] अने तेने [सूत्रस्य ज्ञप्तिः] सूत्रनी ज्ञप्ति (श्रुतज्ञान) [भणिता] कही छे.