Pravachansar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 35.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन
५९

अथात्मज्ञानयोः कर्तृकरणताकृतं भेदमपनुदति जो जाणदि सो णाणं ण हवदि णाणेण जाणगो आदा

णाणं परिणमदि सयं अट्ठा णाणट्ठिया सव्वे ।।३५।।
यो जानाति स ज्ञानं न भवति ज्ञानेन ज्ञायक आत्मा
ज्ञानं परिणमते स्वयमर्था ज्ञानस्थिताः सर्वे ।।३५।।

अपृथग्भूतकर्तृकरणत्वशक्तिपारमैश्वर्ययोगित्वादात्मनो य एव स्वयमेव जानाति स एव ज्ञानमन्तर्लीनसाधकतमोष्णत्वशक्तेः स्वतंत्रस्य जातवेदसो दहनक्रियाप्रसिद्धेरुष्ण- ज्ञानी न भवतीत्युपदिशतिजो जाणदि सो णाणं यः कर्ता जानाति स ज्ञानं भवतीति तथा हि यथा संज्ञालक्षणप्रयोजनादिभेदेऽपि सति पश्चादभेदनयेन दहनक्रियासमर्थोष्णगुणेन परिणतो- ऽग्निरप्युष्णो भण्यते, तथार्थक्रियापरिच्छित्तिसमर्थज्ञानगुणेन परिणत आत्मापि ज्ञानं भण्यते तथा चोक्तम्‘जानातीति ज्ञानमात्मा’ ण हवदि णाणेण जाणगो आदा सर्वथैव भिन्नज्ञानेनात्मा ज्ञायको न

हवे आत्मा अने ज्ञाननो कर्तृत्व -करणत्वकृत भेद दूर करे छे (अर्थात् परमार्थे अभेद आत्मामां, ‘आत्मा जाणनक्रियानो कर्ता छे अने ज्ञान करण छे’ एम व्यवहारे भेद पाडवामां आवे छे, तोपण आत्मा ने ज्ञान जुदां नहि होवाथी अभेदनयथी ‘आत्मा ज ज्ञान छे’ एम समजावे छे)ः

जे जाणतो ते ज्ञान, नहि जीव ज्ञानथी ज्ञायक बने;
पोते प्रणमतो ज्ञानरूप, ने ज्ञानस्थित सौ अर्थ छे. ३५.

अन्वयार्थः[यः जानाति] जे जाणे छे [सः ज्ञानं] ते ज्ञान छे (अर्थात् जे ज्ञायक छे ते ज ज्ञान छे), [ज्ञानेन] ज्ञान वडे [आत्मा] आत्मा [ज्ञायकः भवति] ज्ञायक छे [न] एम नथी. [स्वयं] पोते ज [ज्ञानं परिणमते] ज्ञानरूपे परिणमे छे [सर्वे अर्थाः] अने सर्व पदार्थो [ज्ञानस्थिताः] ज्ञानस्थित छे.

टीकाःआत्मा अपृथग्भूत कर्तृत्व अने करणत्वनी शक्तिरूप पारमैश्वर्यवाळो होवाथी, जे स्वयमेव जाणे छे (अर्थात् जे ज्ञायक छे) ते ज ज्ञान छे; जेम साधकतम उष्णत्वशक्ति जेनामां अंतर्लीन छे एवा स्वतंत्र अग्निने, दहनक्रियानी प्रसिद्धि होवाथी

१. पारमैश्वर्य = परम सामर्थ्य; परमेश्वरता.
२. साधकतम अर्थात्
उत्कृष्ट साधन ते करण.

३. जे स्वतंत्रपणे करे ते कर्ता.
४. अग्नि बाळवानी क्रिया करतो होवाथी अग्निने उष्णता अर्थात्
गरमी कहेवामां आवे छे.