जं तक्कालियमिदरं जाणदि जुगवं समंतदो सव्वं ।
सांख्यानां दूषणं न भवति, भूषणमेव । नैवम् । संसाराभावो हि मोक्षो भण्यते, स च संसारिजीवानां न दृश्यते, प्रत्यक्षविरोधादिति भावार्थः ।।४६।। एवं रागादयो बन्धकारणं, न च ज्ञानमित्यादि- व्याख्यानमुख्यत्वेन षष्ठस्थले गाथापञ्चकं गतम् । अथ प्रथमं तावत् केवलज्ञानमेव सर्वज्ञस्वरूपं, जायेंगे अर्थात् नित्यमुक्त सिद्ध होवेंगे ! किन्तु ऐसा स्वीकार नहीं किया जा सकता; क्योंकि आत्मा परिणामधर्मवाला होनेसे, जैसे स्फ टिकमणि, जपाकुसुम और तमालपुष्पके रंग -रूप स्वभावयुक्ततासे प्रकाशित होता है उसीप्रकार, उसे (आत्माके) शुभाशुभ -स्वभावयुक्तता प्रकाशित होती है । (जैसे स्फ टिकमणि लाल और काले फू लके निमित्तसे लाल और काले स्वभावमें परिणमित दिखाई देता है उसीप्रकार आत्मा कर्मोपाधिके निमित्तसे शुभाशुभ स्वभावरूप परिणमित होता हुआ दिखाई देता है) ।
भावार्थ : — जैसे शुद्धनयसे कोई जीव शुभाशुभ भावरूप परिणमित नहीं होता उसीप्रकार यदि अशुद्धनयसे भी परिणमित न होता हो तो व्यवहारनयसे भी समस्त जीवोंके संसारका अभाव हो जाये और सभी जीव सदा मुक्त ही सिद्ध होजावें ! किन्तु यह तो प्रत्यक्ष विरुद्ध है । इसलिये जैसे केवलीभगवानके शुभाशुभ परिणामोंका अभाव है उसीप्रकार सभी जीवोंके सर्वथा शुभाशुभ परिणामोंका अभाव नहीं समझना चाहिये ।।४६।।
अब, पुनः प्रकृतका ( – चालु विषयका) अनुसरण करके अतीन्द्रिय ज्ञानको सर्वज्ञरूपसे अभिनन्दन करते हैं । (अर्थात् अतीन्द्रिय ज्ञान सबका ज्ञाता है ऐसी उसकी प्रशंसा करते हैं )
अन्वयार्थ : — [यत् ] जो [युगपद् ] एक ही साथ [समन्ततः ] सर्वतः (सर्व आत्मप्रदेशोंसे) [तात्कालिकं ] तात्कालिक [इतरं ] या अतात्कालिक, [विचित्रविषमं ]
७८प्रवचनसार[ भगवानश्रीकुंदकुंद-