Pravachansar (Hindi). Gatha: 90.

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कहानजैनशास्त्रमाला ]
ज्ञानतत्त्व -प्रज्ञापन
१५३

य एव स्वकीयेन चैतन्यात्मकेन द्रव्यत्वेनाभिसंबद्धमात्मानं परं च परकीयेन यथोचितेन द्रव्यत्वेनाभिसंबद्धमेव निश्चयतः परिच्छिनत्ति, स एव सम्यगवाप्तस्वपरविवेकः सकलं मोहं क्षपयति अतः स्वपरविवेकाय प्रयतोऽस्मि ।।८९।।

अथ सर्वथा स्वपरविवेकसिद्धिरागमतो विधातव्येत्युपसंहरति तम्हा जिणमग्गादो गुणेहिं आदं परं च दव्वेसु

अभिगच्छदु णिम्मोहं इच्छदि जदि अप्पणो अप्पा ।।९०।।
तस्माज्जिनमार्गाद्गुणैरात्मानं परं च द्रव्येषु
अभिगच्छतु निर्मोहमिच्छति यद्यात्मन आत्मा ।।९०।।

मात्मानं जानाति यदि कथंभूतम् स्वकीयशुद्धचैतन्यद्रव्यत्वेनाभिसंबद्धं, न केवलमात्मानम्, परं च यथोचितचेतनाचेतनपरकीयद्रव्यत्वेनाभिसंबद्धम् कस्मात् णिच्छयदो निश्चयतः निश्चयनयानुकूलं

टीका : जो निश्चयसे अपनेको स्वकीय (अपने) चैतन्यात्मक द्रव्यत्वसे संबद्ध (-संयुक्त) और परको परकीय (दूसरेके) यथोचित द्रव्यत्वसे संबद्ध जानता है, वही (जीव), जिसने कि सम्यक्त्वरूपसे स्व -परके विवेकको प्राप्त किया है, सम्पूर्ण मोहका क्षय करता है इसलिये मैं स्व -परके विवेकके लिये प्रयत्नशील हूँ ।।८९।।

अब, सब प्रकारसे स्वपरके विवेककी सिद्धि आगमसे करने योग्य है, ऐसा उपसंहार करते हैं :

अन्वयार्थ :[तस्मात् ] इसलिये (स्व -परके विवेकसे मोहका क्षय किया जा सकता है इसलिये) [यदि ] यदि [आत्मा ] आत्मा [आत्मनः ] अपनी [निर्मोहं ] निर्मोहता [इच्छति ] चाहता हो तो [जिनमार्गात् ] जिनमार्गसे [गुणैः ] गुणोंके द्वारा [द्रव्येषु ] द्रव्योंमें [ आत्मानं परं च ] स्व और परको [अभिगच्छतु ] जानो (अर्थात् जिनागमके द्वारा विशेष गुणोंसे ऐसा विवेक करो किअनन्त द्रव्योंमेंसे यह स्व है और यह पर है) ।।९०।।

तेथी यदि जीव इच्छतो निर्मोहता निज आत्मने,
जिनमार्गथी द्रव्यो महीं जाणो स्व -परने गुण वडे. ९०
.
प्र. २०

१. यथोचित = यथायोग्यचेतन या अचेतन (पुद्गलादि द्रव्य परकीय अचेतन द्रव्यत्वसे और अन्य आत्मा परकीय चेतन द्रव्यत्वसे संयुक्त हैं)।