Pravachansar (Hindi). Gatha: 109.

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गुणस्याभावे द्रव्यस्याभाव इत्युभयशून्यत्वं स्यात् यथा पटाभावमात्र एव घटो घटाभावमात्र एव पट इत्युभयोरपोहरूपत्वं, तथा द्रव्याभावमात्र एव गुणो गुणाभावमात्र एव द्रव्य- मित्यत्राप्यपोहरूपत्वं स्यात् ततो द्रव्यगुणयोरेकत्वमशून्यत्वमनपोहत्वं चेच्छता यथोदित एवातद्भावोऽभ्युपगन्तव्यः ।।१०८।।

अथ सत्ताद्रव्ययोर्गुणगुणिभावं साधयति

जो खलु दव्वसहावो परिणामो सो गुणो सदविसिट्ठो

सदवट्ठिदं सहावे दव्वं ति जिणोवदेसोयं ।।१०९।। जीवप्रदेशेभ्यः पुद्गलद्रव्यं भिन्नं सद्द्रव्यान्तरं भवति तथा सत्तागुणप्रदेशेभ्यो मुक्तजीवद्रव्यं सत्तागुणाद्भिन्नं सत्पृथग्द्रव्यान्तरं प्राप्नोति एवं किं सिद्धम् सत्तागुणरूपं पृथग्द्रव्यं मुक्तात्मद्रव्यं च पृथगिति द्रव्यद्वयं जातं, न च तथा द्वितीयं च दूषणं प्राप्नोतियथा सुवर्णत्वगुणप्रदेशेभ्यो द्रव्य तथा गुण दोनोंके अभावका प्रसंग आ जायगा ) (अथवा अपोहरूपता नामक तीसरा दोष इसप्रकार आता है :)

(३) जैसे पटाभावमात्र ही घट है, घटाभावमात्र ही पट है, (अर्थात् वस्त्रके केवल अभाव जितना ही घट है, और घटके केवल अभाव जितना ही वस्त्र है)इसप्रकार दोनोंके अपोहरूपता है, उसीप्रकार द्रव्याभावमात्र ही गुण और गुणाभावमात्र ही द्रव्य होगा;इसप्रकार इसमें भी (द्रव्य -गुणमें भी) अपोहरूपता आ जायगी, (अर्थात् केवल नकाररूपताका प्रसङ्ग आ जायगा )

इसलिये द्रव्य और गुणका एकत्व, अशून्यत्व और अनपोहत्व चाहनेवालेको यथोक्त ही (जैसा कहा वैसा ही) अतद्भाव मानना चाहिये ।।१०८।।

अब, सत्ता और द्रव्यका गुणगुणीपना सिद्ध करते हैं :

परिणाम द्रव्यस्वभाव जे, ते गुण ‘सत्’-अविशिष्ट छे; ‘द्रव्यो स्वभावे स्थित सत् छे’ए ज आ उपदेश छे. १०९.

२१प्रवचनसार[ भगवानश्रीकुंदकुंद-

१. अपोहरूपता = सर्वथा नकारात्मकता; सर्वथा भिन्नता (द्रव्य और गुणमें एक -दूसरेका केवल नकार ही हो तो ‘द्रव्य गुणवाला है’ ‘यह गुण इस द्रव्यका है’इत्यादि कथनसे सूचित किसी प्रकारका सम्बन्ध ही द्रव्य और गुणके नहीं बनेगा )

२. अनपोहत्व = अपोहरूपताका न होना; केवल नकारात्मकताका न होना