मोहक्षयके उपायभूत जिनोपदेशकी प्राप्ति होने
स्व – परके विवेककी सिद्धिसे ही मोहका क्षय
पुण्योत्पादक शुभोपयोगकी पापोत्पादक
सिद्धिके लिये प्रयत्न...... ............... ८९ सब प्रकारके स्वपरके विवेककी सिद्धि
आगमसे कर्तव्य है — इस प्रकार
उपसंहार करते हैं...... .................. ९०
पुण्य और पापकी अविशेषताका निश्चय
जिनोदित अर्थोंके श्रद्धान बिना धर्मलाभ
नहीं होता..... .......................... ९१
करते हैं..... ............................ ७७
स्वयं साक्षात् धर्म ही हूँ’ ऐसे भावमें निश्चल स्थित होते हैं...... .............. ९२
अशेषदुःखक्षयका दृढ निश्चय करके
शुद्धोपयोगमें निवास...... ................ ७८
मोहकी सेना जीतनेका उपाय...... ............ ८०
चिन्तामणि प्राप्त किया होने पर भी, प्रमाद चोर
पदार्थका सम्यक् द्रव्यगुणपर्यायस्वरूप...... ...... ९३ स्वसमय – परसमयकी व्यवस्था निश्चित
विद्यमान है अतः जागृत रहता है ........ ८१ यही एक, भगवन्तोंने स्वयं अनुभव करके प्रगट
किया हुआ मोक्षका पारमार्थिकपन्थ है ... ८२
स्वरूप – अस्तित्वका कथन ....................... ९६
शुद्धात्मलाभके परिपंथी – मोहका स्वभाव और
उसके प्रकार.... ......................... ८३
तीन प्रकारके मोहको अनिष्ट कार्यका कारण
कहकर उसके क्षयका उपदेश............. ८४
मोहरागद्वेषको इन चिह्नोंके द्वारा पहिचान कर उत्पन्न
होते ही नष्ट कर देना चाहिये ........... ८५
मोहक्षय करनेका उपायान्तर..... ............... ८६