चान्यः संभवोऽन्यो विलय इति कृत्वा संभवविलयवन्तौ देवादिमनुष्यादिपर्यायौ संभाव्येते एव
ततः प्रतिक्षणं पर्यायैर्जीवोऽनवस्थितः ।।११९।।
घटाधारभूतमृत्तिकाद्रव्यवत् मनुष्यपर्यायदेवपर्यायाधारभूतसंसारिजीवद्रव्यवद्वा । क्षणभङ्गसमुद्भवे हेतुः कथ्यते । संभवविलय त्ति ते णाणा संभवविलयौ द्वाविति तौ नाना भिन्नौ यतः कारणात्ततः पर्यायार्थिकनयेन भङ्गोत्पादौ । तथाहि – य एव पूर्वोक्तमोक्षपर्यायस्योत्पादो मोक्षमार्गपर्यायस्य विनाश- स्तावेव भिन्नौ न च तदाधारभूतपरमात्मद्रव्यमिति । ततो ज्ञायते द्रव्यार्थिकनयेन नित्यत्वेऽपि पर्यायरूपेण विनाशोऽस्तीति ।।११९।। अथ विनश्वरत्वे कारणमुपन्यस्यति, अथवा प्रथमस्थलेऽ- धिकारसूत्रेण मनुष्यादिपर्यायाणां कर्मजनितत्वेन यद्विनश्वरत्वं सूचितं तदेव गाथात्रयेण विशेषेण है’ ऐसा कहा जाने पर, उन दोनोंके आधारभूत ध्रौव्यका अन्यपना असंभवित होनेसे उत्पाद और व्ययका स्वरूप प्रगट होता है; इसलिये देवादिपर्यायके उत्पन्न होने पर और मनुष्यादिपर्यायके नष्ट होने पर, ‘अन्य उत्पाद है और अन्य व्यय है’ ऐसा माननेसे (इस अपेक्षासे) उत्पाद और व्ययवाली देवादिपर्याय और मनुष्यादिपर्याय प्रगट होती है (-लक्षमें आती है ); इसलिये जीव प्रतिक्षण पर्यायोंसे अनवस्थित है ।।११९।। अब, जीवकी अनवस्थितताका हेतु प्रगट करते हैं : —
अन्वयार्थ : — [तस्मात् तु ] इसलिये [संसारे ] संसारमें [स्वभावसमवस्थितः इति ] स्वभावसे अवस्थित ऐसा [कश्चित् न अस्ति ] कोई नहीं है; (अर्थात् संसारमें किसीका स्वभाव केवल एकरूप रहनेवाला नहीं है ); [संसारः पुनः ] और संसार तो [संसरतः ] संसरण करते हुये (गोल फि रते हुये, परिवर्तित होते हुये) [द्रव्यस्य ] द्रव्यकी [क्रिया ] क्रिया है ।।१२०।।
तेथी स्वभावे स्थिर एवुं न कोई छे संसारमां; संसार तो संसरण करता द्रव्य केरी छे क्रिया. १२०.