नवच्छिन्नविषयत्वाभ्यां चाभिलषितं जिज्ञासितं सन्दिग्धं चार्थं ध्यायन् दृष्टः, भगवान् सर्वज्ञस्तु निहतघनघातिकर्मतया मोहाभावे ज्ञानशक्तिप्रतिबन्धकाभावे च निरस्ततृष्णत्वात्प्रत्यक्षसर्वभाव- तत्त्वज्ञेयान्तगतत्वाभ्यां च नाभिलषति, न जिज्ञासति, न सन्दिह्यति च; कुतोऽभिलषितो जिज्ञासितः सन्दिग्धश्चार्थः । एवं सति किं ध्यायति ।।१९७।। तदन्यत्र कथितमास्ते ।।१९६।। एवमात्मपरिज्ञानाद्दर्शनमोहक्षपणं भवतीति कथनरूपेण प्रथमगाथा, दर्शनमोहक्षयाच्चारित्रमोहक्षपणं भवतीति कथनेन द्वितीया, तदुभयक्षयेण मोक्षो भवतीति प्रतिपादनेन तृतीया चेत्यात्मोपलम्भफलकथनरूपेण द्वितीयस्थले गाथात्रयं गतम् । अथोपलब्धशुद्धात्मतत्त्वसकलज्ञानी किं ध्यायतीति प्रश्नमाक्षेपद्वारेण पूर्वपक्षं वा करोति — णिहदघणघादिकम्मो पूर्वसूत्रोदितनिश्चलनिज- परमात्मतत्त्वपरिणतिरूपशुद्धध्यानेन निहतघनघातिकर्मा । पच्चक्खं सव्वभावतच्चण्हू प्रत्यक्षं यथा भवति तथा सर्वभावतत्त्वज्ञः सर्वपदार्थपरिज्ञातस्वरूपः । णेयंतगदो ज्ञेयान्तगतः ज्ञेयभूतपदार्थानां परिच्छित्तिरूपेण पारंगतः। एवंविशेषणत्रयविशिष्टः समणो जीवितमरणादिसमभावपरिणतात्मस्वरूपः श्रमणो महाश्रमणः है और वह विषयको १अवच्छेदपूर्वक नहीं जानता, इसलिये वह (लोक) २अभिलषित, नाश किया जानेसे (१) मोहका अभाव होनेके कारण तथा (२) ज्ञानशक्तिके प्रतिबन्धक का अभाव होनेसे, (१) तृष्णा नष्ट की गई है तथा (२) समस्त पदार्थोंका स्वरूप प्रत्यक्ष है तथा ज्ञेयोंका पार पा लिया है, इसलिये भगवान सर्वज्ञदेव अभिलाषा नहीं करते, जिज्ञासा नहीं करते और संदेह नहीं करते; तब फि र (उनके) अभिलषित, जिज्ञासित और संदिग्ध पदार्थ कहाँसे हो सकता है ? ऐसा है तब फि र वे क्या ध्याते हैं ?
भावार्थ : — लोकके (जगत्के सामान्य जीव समुदायके) मोहकर्मका सद्भाव होनेसे वह तृष्णा सहित है, इसलिये उसे इष्ट पदार्थकी अभिलाषा होती है; और उसके ज्ञानावरणीय कर्मका सद्भाव होनेसे वह बहुतसे पदार्थोंको तो जानता ही नहीं है तथा जिस पदार्थको जानता है उसे भी पृथक्करण पूर्वक — सूक्ष्मतासे — स्पष्टतासे नहीं जानता इसलिये उसे अज्ञात पदार्थको जाननेकी इच्छा (जिज्ञासा) होती है, और अस्पष्टतया जाने हुए पदार्थके संबंधमें संदेह होता है । ऐसा होनेसे उसके अभिलषित, जिज्ञासित और संदिग्ध पदार्थका ध्यान संभवित होता है । परन्तु सर्वज्ञ भगवानके तो मोहकर्मका अभाव होनेसे वे तृष्णारहित हैं, इसलिये उनके अभिलाषा नहीं है; और उनके ज्ञानावरणीय कर्मका अभाव होनेसे वे समस्त पदार्थोंको जानते हैं तथा प्रत्येक पदार्थको अत्यन्त स्पष्टतापूर्वक — परिपूर्णतया जानते हैं इसलिये उन्हें जिज्ञासा या सन्देह नहीं है । इसप्रकार उन्हें किसी पदार्थके प्रति अभिलाषा, जिज्ञासा या सन्देह नहीं होता; तब फि र उन्हें किस पदार्थका ध्यान होता है ? ।।१९७।।
३जिज्ञासित और ४संदिग्ध पदार्थका ध्यान करता हुआ दिखाई देता है; परन्तु घनघातिकर्मका
१. अवच्छेदपूर्वक = पृथक्करण करके; सूक्ष्मतासे; विशेषतासे; स्पष्टतासे । २. अभिलषित = जिसकी इच्छा – चाह हो वह । ३. जिज्ञासित = जिसकी जिज्ञासा जाननेकी इच्छा हो वह । ४. संदिग्ध = जिनमें संदेह हो – संशय हो ।