सूत्रार्थज्ञानबलेन स्वपरद्रव्यविभागपरिज्ञानश्रद्धानविधानसमर्थत्वात्सुविदितपदार्थसूत्रः । सकलषड्जीवनिकायनिशुम्भनविकल्पात्पंचेन्द्रियाभिलाषविकल्पाच्च व्यावर्त्यात्मनः शुद्धस्वरूपे संयमनात्, स्वरूपविश्रान्तनिस्तरंगचैतन्यप्रतपनाच्च संयमतपःसंयुतः । सकलमोहनीयविपाक- विवेकभावनासौष्ठवस्फु टीकृतनिर्विकारात्मस्वरूपत्वाद्विगतरागः । परमकलावलोकनाननुभूयमान- गतरागः । समसुहदुक्खो निर्विकारनिर्विकल्पसमाधेरुद्गता समुत्पन्ना तथैव परमानन्दसुखरसे लीना तल्लया निर्विकारस्वसंवित्तिरूपा या तु परमकला तदवष्टम्भेनेष्टानिष्टेन्द्रियविषयेषु हर्षविषादरहितत्वात्सम- सुखदुःखः । समणो एवंगुणविशिष्टः श्रमणः परममुनिः भणिदो सुद्धोवओगो त्ति शुद्धोपयोगो भणित इत्यभिप्रायः ।।१४।। एवं शुद्धोपयोगफलभूतानन्तसुखस्य शुद्धोपयोगपरिणतपुरुषस्य च कथनरूपेण पञ्चमस्थले गाथाद्वयं गतम् ।।
इति चतुर्दशगाथाभिः स्थलपञ्चकेन पीठिकाभिधानः प्रथमोऽन्तराधिकारः समाप्तः ।।
तदनन्तरं सामान्येन सर्वज्ञसिद्धिर्ज्ञानविचारः संक्षेपेण शुद्धोपयोगफलं चेति कथनरूपेण गाथा-
टीका : — सूत्रोंके अर्थके ज्ञानबलसे स्वद्रव्य और परद्रव्यके विभागके १परिज्ञानमें श्रद्धानमें और विधानमें (आचरणमें) समर्थ होनेसे (स्वद्रव्य और परद्रव्यकी भिन्नताका ज्ञान, श्रद्धान और आचरण होनेसे) जो श्रमण पदार्थोंको और (उनके प्रतिपादक) सूत्रोंको जिन्होंने भलीभाँति जान लिया है ऐसे हैं, समस्त छह जीवनिकायके हननके विकल्पसे और पंचेन्द्रिय सम्बन्धी अभिलाषाके विकल्पसे आत्माको २व्यावृत्त करके आत्माका शुद्धस्वरूपमें संयमन करनेसे, और ३स्वरूपविश्रान्त ४निस्तरंग ५चैतन्यप्रतपन होनेसे जो संयम और तपयुक्त हैं, सकल मोहनीयके विपाकसे भेदकी भावनाकी उत्कृष्टतासे (समस्त मोहनीय कर्मके उदयसे भिन्नत्वकी उत्कृष्ट भावनासे) निर्विकार आत्मस्वरूपको प्रगट किया होनेसे जो वीतराग है, और परमकलाके अवलोकनके कारण साता वेदनीय तथा असाता वेदनीयके विपाकसे उत्पन्न होनेवाले जो सुख -दुःख उन सुख -दुःख जनित परिणामोंकी विषमताका अनुभव नहीं होनेसे (परम सुखरसमें लीन निर्विकार स्वसंवेदनरूप परमकलाके अनुभवके कारण इष्टानिष्ट
२२प्रवचनसार[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
१. परिज्ञान = पूरा ज्ञान; ज्ञान ।
२. व्यावृत्त करके = विमुख करके; रोककर; अलग करके ।
३. स्वरूपविश्रान्त = स्वरूपमें स्थिर हुआ ।
४. निस्तरंग = तरंग रहित; चंचलता रहित; विकल्प रहित; शांत ।
५. प्रतपन होना = प्रतापवान होना, प्रकाशित होना, दैदीप्यमान होना ।