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आ प्रथमानुयोगनां शास्त्रोनां श्रवण, पठन, मनन अने चिंतनादिथी पुण्य, बोधि (रत्नत्रय) अने समाधिनी प्राप्ति थाय छे, कारण के तेओ पुण्यरूप तथा पुण्यनुं कारण छे अने बोधि तथा समाधिनो खजानो छे; अर्थात् जे सम्यग्ज्ञान, आख्यान, चरित्र अने पुराणोरूप शास्त्रोने जाणे छे ते भावश्रुत ज्ञानने आचार्य प्रथमानुयोग कहे छे. आ अनुयोग सम्यग्ज्ञाननो विषय छे.
१‘‘जैनमतमां उपदेश चार अनुयोगनो आप्यो छे. प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग अने द्रव्यानुयोग — ए चार अनुयोग छे. त्यां तीर्थंकर – चक्रवर्ती आदि महान पुरुषोनां चरित्र जेमां निरूपण कर्यां होय ते ‘प्रथमानुयोग’ छे, गुणस्थान – मार्गणादिरूप जीवनुं, कर्मोनुं वा त्रिलोकादिनुं जेमां निरूपण होय ते ‘करणानुयोग’ छे, गृहस्थ – मुनिना धर्म आचरण करवानुं जेमां निरूपण होय ते ‘चरणानुयोग’ छे तथा छ द्रव्य, सात तत्त्वादिक अने स्व – पर भेदविज्ञानादिकनुं जेमां निरूपण होय ते ‘द्रव्यानुयोग’ छे.’’
‘‘प्रथमानुयोगः प्रथमं मिथ्यादृष्टिमव्रतिकमव्युत्पन्नं वा प्रतिपाद्यमाश्रित्य प्रवृत्तोऽनुयोगोऽधिकारः प्रथमानुयोगः। ’’२
अर्थः — प्रथम अर्थात् मिथ्याद्रष्टि – अव्रती, विशेष ज्ञान रहित शिष्यने उद्देशी प्रवृत्त थयेलो अनुयोग अर्थात् अधिकार ते प्रथमानुयोग छे.
‘‘प्रथमानुयोगमां तो संसारनी विचित्रता, पुण्य – पापनां फळ तथा महापुरुषोनी प्रवृत्ति इत्यादि निरूपणथी जीवोने धर्ममां लगाव्या छे. जे जीव तुच्छ बुद्धिवान होय ते पण आ अनुयोगथी धर्मसन्मुख थाय छे, कारण के जीव सूक्ष्म निरूपणने समजतो नथी, पण लौकिक वार्ताओने ज जाणे छे तथा त्यां तेनो उपयोग पण लागे छे. प्रथमानुयोगमां पण लौकिक प्रवृत्तिरूप निरूपण होवाथी तेने ते बराबर समजी शके छे. १. अने ३. मोक्षमार्ग प्रकाशक गुजराती आवृत्ति पृष्ठ २७१, २७२, वधु माटे जुओ पृष्ठ २७४
२. गोम्मटसार जीवकांड गाथा ३६१ – ३६२नी टीका.