कहानजैनशास्त्रमाळा ]
‘‘वळी लोकमां तो राजादिकनी कथाओमां पाप छोडवानुं वा पुण्यनुं पोषण छे. त्यां राजादिक महापुरुषोनी कथा सांभळे छे, परंतु तेनुं प्रयोजन ज्यां – त्यांथी पापने छोडी धर्ममां लगाववानुं प्रगट कर्युं छे. तेथी ते जीव कथाओनी लालच वडे पण तेने वांचे – सांभळे तो पाछळथी पापने बूरुं तथा धर्मने भलो गणी धर्ममां रुचिवान थाय छे. ए प्रमाणे तुच्छ बुद्धिवानोने समजाववा माटे आ अनुयोग छे......
‘‘वळी जे जीवोने तत्त्वज्ञान थयुं होय तेओ आ अनुयोग वांचे – सांभळे तो तेमने आ उदाहरणरूप भासे छे. जेम के जीव अनादिनिधन छे तथा शरीरादि संयोगी पदार्थ छे – एम जाणतो हतो. हवे पुराणादिकमां जीवोनां भवान्तरनुं निरूपण कर्युं छे ते ए जाणवामां उदाहरणरूप थयुं.
‘‘वळी आ शुभ – अशुभ – शुद्धोपयोगने जाणतो हतो, वा तेना फळने जाणतो हतो. हवे पुराणोमां ते उपयोगोनी प्रवृत्ति तथा तेनुं फळ जीवोने जे थयुं होय तेनुं निरूपण कर्युं छे. ए ज आ जाणवामां उदाहरणरूप थयुं,.......
‘‘.......धर्मात्मा छे ते, धर्मीओनी प्रशंसा अने पापीओनी निंदा जेमां होय एवी कोई पुराण पुरुषोनी कथा सांभळवाथी धर्ममां अति उत्साहवान थाय छे. ए प्रमाणे आ प्रथमानुयोगनुं प्रयोजन जाणवुं.’’ ४३.
अन्वयार्थ : — [तथा ] तेवी ज रीते (प्रथमानुयोगना प्रकारे) [मतिः ] सम्यग्ज्ञान (मननरूप श्रुतज्ञान) [आदर्शम् इव ] दर्पणनी जेम [लोकालोकविभक्तेः ] १. संपादनार्थमुपलब्धेषु पुस्तकेषु ‘क’ पुस्तके इतोग्रे इयं गाथा समुपलभ्यते ‘अह उड्ढतिरियलोए दिसि
संमिलिता भवेदिति प्रतिभाति ।