कहानजैनशास्त्रमाळा ]
नरकतिर्यग्मनुष्यदेवलक्षणानामादर्शमिव ।।४४।। जाणवामां दर्पण समान छे – एम श्रुतज्ञान (सम्यग्ज्ञान) जाणे छे.
‘‘.........करण एटले गणित कार्यना कारणरूप जे सूत्र, तेनो जेमां ‘अनुयोग’ अर्थात् अधिकार होय ते करणानुयोग छे. आ अनुयोगमां गणित – वर्णननी मुख्यता छे.’’१
‘‘करणानुयोगमां जीवोनी वा कर्मोनी विशेषता तथा त्रिलोकादिकनी रचना निरूपण करी जीवोने धर्ममां लगाव्या छे. जे जीव धर्ममां उपयोग लगाववा इच्छे छे ते जीवोनां गुणस्थान – मार्गणादि भेद तथा त्रण लोकमां नरक – स्वर्गादिनां ठेकाणां ओळखी पापथी विमुख थई धर्ममां लागे छे. वळी जो एवा विचारोमां उपयोग रमी जाय तो पापप्रवृत्ति छूटी स्वयं तत्काळ धर्म ऊपजे छे, तथा तेना अभ्यासथी तत्त्वज्ञाननी पण प्राप्ति थाय छे. वळी आवुं सूक्ष्म अने यथार्थ पदार्थकथन जैनमतमां ज छे, अन्य ठेकाणे नथी एवो तेनो महिमा जाणी ते जैनमतनो श्रद्धानी थाय छे.
‘‘बीजुं जे जीव तत्त्वज्ञानी होय ते आ करणानुयोगनो अभ्यास करे तो तेने आ तेना विशेषणरूप भासे छे; जेम जीवादिक तत्त्वोने पोते जाणे छे, हवे तेना ज विशेष (भेद) करणानुयोगमां कर्या छे. तेमां कोई विशेषण तो यथावत् निश्चयरूप छे तथा कोई उपचार सहित व्यवहाररूप छे. कोई द्रव्य – क्षेत्र – काल – भावादिकनुं स्वरूप प्रमाणादिकरूप छे तथा कोई निमित्त – आश्रयादिनी अपेक्षा सहित छे, इत्यादि अनेक प्रकारनां विशेषण त्यां निरूपण कर्यां छे. तेने जेम छे तेम जाणीने आ करणानुयोगने अभ्यासे तो ए अभ्यासथी तत्त्वज्ञान निर्मळ थाय छे......
‘‘वळी अन्य ठेकाणे उपयोगने लगावे तो रागादिकनी वृद्धि थाय तथा छद्मस्थनो उपयोग निरंतर एकाग्र रहे नहि, माटे ज्ञानी पुरुष आ करणानुयोगना अभ्यासमां पोतानो उपयोग लगावे छे, जे वडे केवळज्ञान वडे देखेला पदार्थोनुं जाणपणुं तेने थाय छे. भेदमात्र त्यां प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्षनो ज छे, पण भासवामां विरुद्धता नथी. ए प्रमाणे १. मोक्षमार्ग प्रकाशक, गुजराती आवृत्ति, पृष्ठ २७६.