कहानजैनशास्त्रमाळा ]
चारित्रप्रतिपादकं शास्त्रमाचाराङ्गादि । कथंभूतं ? ‘चारित्रोत्पत्तिवृद्धिरक्षाङ्गं’ चारित्रस्योत्पत्तिश्च वृद्धिश्च रक्षा च तासामङ्गं कारणं अंगानि वा कारणानि प्ररूप्यन्ते यत्र । केषां तदङ्गं ? ‘गृहमेध्यनगाराणां’ गृहमेधिनः श्रावकाः अनगारा मुनयस्तेषां ।।४५।। ‘चारित्रोत्पत्तिवृद्धिरक्षाङ्गम्’ चारित्रनी उत्पत्ति, वृद्धि अने रक्षाना अंगनी कारणनी अथवा कारणोनी – जेमां प्ररूपणा करवामां आवी छे तेवा (शास्त्रने). कोना चारित्रनी उत्पत्ति, वृद्धि अने रक्षानां कारणभूत? ‘गृहमेध्यनगाराणाम्’ श्रावको अने मुनिओनां (चारित्रनी उत्पत्ति, वृद्धि अने रक्षाना कारणभूत).
भावार्थ : — जे शास्त्रमां गृहस्थ अने मुनिओनां चारित्रनी उत्पत्ति, वृद्धि अने रक्षानां कारणोनुं वर्णन होय तेने चरणानुयोग कहे छे. आ अनुयोग पण सम्यग्ज्ञाननो विषय छे, अर्थात् गृहस्थ अने मुनिओना चारित्रनी उत्पत्ति, वृद्धि अने रक्षानां कारणभूत चरणानुयोग शास्त्र छे, एम सम्यग्ज्ञान (भावश्रुतज्ञान) जाणे छे.
‘‘चरणानुयोगमां नाना प्रकारनां धर्मसाधन निरूपण करी जीवोने धर्ममां लगावीए छीए. जे जीव हित – अहितने जाणतो नथी अने हिंसादि पापकार्योमां तत्पर थई रह्यो छे, तेने जेम ते पापकार्योने छोडी धर्मकार्योमां जोडाय तेम अहीं उपदेश आप्यो छे. तेने जाणी जिनधर्माचरण करवाने सन्मुख थतां ते जीव गृहस्थ – मुनिधर्मनुं विधान सांभळी पोतानाथी जेवो धर्म सधाय तेवो धर्मसाधनमां लागे छे. एवा साधनथी कषाय पण मंद थाय छे अने तेना फळमां एटलुं तो थाय छे के ते कुगतिनां दुःख न पामतां सुगतिनां सुख पामे. वळी एवा साधनथी जैनमतनां निमित्त पण बन्यां रहे छे. त्यां तेने तत्त्वज्ञाननी प्राप्ति थवानी होय तो थई जाय.
‘‘बीजुं जे जीव तत्त्वज्ञानी थई आ चरणानुयोगने अभ्यासे छे तेने ए बधां आचरण पोताना वीतरागभाव अनुसार भासे छे. एकदेश वा सर्वदेश वीतरागता थतां एवी श्रावक – मुनिनी दशा थाय छे, कारण के ए एकदेश – सर्वदेश वीतरागता अने श्रावक – मुनि दशाने निमित्त – नैमित्तिकपणुं होय छे, एम जाणी श्रावक – मुनि धर्मना भेदोने ओळखी जेवो पोताने वीतरागभाव थयो होय तेवो ते पोताने योग्य धर्म होय तेने साधे छे. तेमां पण जेटलो अंश वीतरागता होय छे तेने ते कार्यकारी जाणे छे, जेटलो अंश राग रहे छे तेने हेय जाणे छे तथा संपूर्ण वीतरागताने परम धर्म माने छे.