Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 46 dravyAnuyoganu swarup.

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रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
जीवाजीवसुतत्त्वे पुण्यापुण्ये च बन्धमोक्षौ च
द्रव्यानुयोगदीपः श्रुतविद्यालोकमातनुते ।।४६।।

‘द्रव्यानुयोगदीपो’ ‘द्रव्यानुयोगसिद्धान्तसूत्रं तत्त्वार्थसूत्रादिस्वरूपो द्रव्यागमः स एव दीपः स ‘आतनुते’ विस्तारयति अशेषविशेषतः प्ररूपयति के ? ‘जीवाजीवसुतत्त्वे’ उपयोगलक्षणो जीवः तद्विपरीतोऽजीवः तावेव शोभने अबाधिते तत्त्वे वस्तुस्वरूपे आतनुते तथा ‘पुण्यापुण्ये’ सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि हि पुण्यं ततोऽन्यत्कर्मापुण्यमुच्यते, ते च मूलोत्तरप्रकृतिभेदेनाशेषविशेषतो द्रव्यानुयोगदीप आतमुते तथा ‘बन्धमोक्षौ च’

ए प्रमाणे चरणानुयोगनुं प्रयोजन छे.’’. ४५.

द्रव्यानुयोगनुं स्वरुप
श्लोक ४६

अन्वयार्थ :[द्रव्यानुयोगदीपः ] द्रव्यानुयोगरूपी दीपक [जीवाजीवसुतत्त्वै ] जीव अने अजीव सुतत्त्वोने, [पुण्यापुण्ये ] पुण्य तथा पापने [च ] अने [बन्धमोक्षौ ] बंध तथा मोक्षने [श्रुतविद्यालोकं ] भावश्रुतज्ञाननो प्रकाश थाय तेवी रीते [आतनुते ] विस्तारपूर्वक निरूपे छेप्रगट करे छे.

टीका :द्रव्यानुयोगदीपो’ द्रव्यानुयोग सिद्धान्तसूत्रतत्त्वार्थ सूत्रादि स्वरूप द्रव्यागमएवो ज दीपक (अर्थात् द्रव्यानुयोगरूपी दीपक) ते आतनुते’ विस्तारे छे अर्थात् संपूर्णपणे प्ररूपे छे. कोने (प्ररूपे छे)? जीवाजीवसुतत्त्वे’ जेनुं लक्षण उपयोग छे ते जीव अने तेनाथी विपरीत लक्षण जेनुं छे ते अजीव छे. ते बंने शोभन (सुंदर)अबाधित तत्त्वोनेवस्तु स्वरूपने प्ररूपे छे. तथा पुण्यापुण्ये’ शातावेदनी, शुभआयु, शुभनाम अने शुभगोत्रए पुण्यकर्म छे. अने तेनाथी अन्य विपरीत कर्म (अर्थात् अशातावेदनी, अशुभआयु, अशुभनाम अने अशुभगोत्र) अपुण्य (पाप) कर्म कहेवाय छे. तेमने मूल प्रकृति अने उत्तर प्रकृतिना भेदथी समस्त विषयोपूर्वक द्रव्यानुयोगरूपी दीपक प्रगट करे छे. तथा बन्धमोक्षौ च’ मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय अने योगरूप कारणोथी १. द्रव्यानुयोगः सिद्धान्तः ख २. मोक्षमार्ग प्रकाशक, गुजराती आवृत्ति पृष्ठ २७३.

वधु माटे जुओ पृष्ठ २८० थी २८६, २९३, २९४.