Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration). DravyAnuyoganu prayojan.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १३१

मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकषाययोगलक्षणहेतुवशादुपार्जितेन कर्मणा सहात्मनः संश्लेषो बन्धः बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षलक्षणो मोक्षस्तावप्यशेषतः द्रव्यानुयोगदीप आतनुते कथं ? श्रुतविद्यालोकं श्रुतविद्या भावश्रुतं सैवालोकः प्रकाशो यत्र कर्मणि तद्यथा भवत्येवं जीवादीनि स प्रकाशयतीति ।।४६।।


उपार्जित करेलां कर्म साथे आत्मानो संश्लेष (गाढ संबंध) ते बंध, बंध हेतुनो अभाव (आस्रवनो अभाव अर्थात् संवर) अने निर्जराथी (संवर अने निर्जरा ए बंनेथी) समस्त कर्मनो छूटकारो थवो ते मोक्ष छे. ते बंनेने बंध अने मोक्षने पण द्रव्यानुयोगरूपी दीपक संपूर्णपणे प्रगट करे छे. केवी रीते? श्रुतविद्यालोकं’ श्रुतज्ञान एटले भावश्रुतज्ञानतेनो प्रकाश जे रीते थाय ते रीते, ते (द्रव्यानुयोग दीपक) जीवादिने प्रकाशे छे.

भावार्थ :द्रव्यानुयोगरूपी दीपक, जीवअजीव सुतत्त्वोने, पुण्यपापने अने बंधमोक्ष तत्त्वोने, जे रीते भावश्रुतज्ञाननो प्रकाश थाय ते रीते, प्रगट करे छेविस्तारे छे. आ अनुयोग पण सम्यग्ज्ञाननो विषय छे, अर्थात् जे ज्ञान जीवअजव सुतत्त्वोने, पुण्यपाप तत्त्वोने अने बंधमोक्ष तत्त्वोने प्रकाशित करे छेजाणे छे ते द्रव्यानुयोग भावश्रुतज्ञान छे.

विशेष
द्रव्यानुयोगनुं प्रयोजन

‘‘द्रव्यानुयोगमां द्रव्योना अने तत्त्वोना निरूपण वडे जीवोने धर्ममां लगावीए छीए. जे जीव, जीवअजीवादि द्रव्योने वा तत्त्वोने ओळखतो नथी तथा स्वपरने जाणतो नथी, तेने हेतुद्रष्टान्तयुक्ति अने प्रमाणनयादि वडे तेनुं स्वरूप ए प्रमाणे अहीं बताव्युं छे; के जेथी तेने तेनी प्रतीति थई जाय अने तेना अभ्यासथी अनादि अज्ञानता दूर थई अन्य मतनां कल्पित तत्त्वादिक जूठां भासे त्यारे जैनमतनी प्रतीति पण थाय तथा जो तेना भावनो अभ्यास राखे तो तेने तुरत ज तत्त्वज्ञाननी प्राप्ति थई जाय.

‘‘वळी जेने तत्त्वज्ञाननी प्राप्ति थई होयतत्त्वज्ञान थयुं होय ते जीव आ द्रव्यानुयोगनो अभ्यास करे तो तेने पोताना श्रद्धान अनुसार ए बधां कथन प्रतिभासे छे. जेम कोईए, कोई विद्या शीखी लीधी होय पण जो ते तेनो अभ्यास राख्या करे, तो ते याद रहे, न राखे तो भूली जाय, तेम आने तत्त्वज्ञान तो थयुं छे, परंतु जो ते १. तेन कर्मणि ग