Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
इति प्रभाचन्द्रविरचितायां समन्तभद्रस्वामिविरचितोपासकाध्ययनटीकायां
द्वितीयः परिच्छेदः ।।।।

द्रव्यानुयोगनो अभ्यास कर्या करे तो ते तत्त्वज्ञान टकी रहे, न करे तो भूली पण जाय, अथवा संक्षेपताथी तत्त्वज्ञान थयुं हतुं ते अहीं नाना युक्तिहेतुद्रष्टान्तादि वडे स्पष्ट थई जाय तो पछी तेमां शिथिलता थई शके नहि अने तेना अभ्यासथी रागादिक घटवाथी अल्पकाळमां मोक्ष सधाय. ए प्रमाणे द्रव्यानुयोगनुं प्रयोजन जाणवुं......’’

‘‘शंकाःद्रव्यानुयोगरूप अध्यात्म उपदेश छे, ते उत्कृष्ट छे अने ते उच्च दशाने प्राप्त होय तेने ज कार्यकारी छे पण नीचली दशावाळाओने तो व्रतसंयमादिनो ज उपदेश आपवो योग्य छे.’’

‘‘समाधानःजिनमतमां तो एवी परिपाटी छे के पहेलां सम्यक्त्व होय, पछी व्रत होय; हवे सम्यक्त्व तो स्वपरनुं श्रद्धान थतां थाय छे तथा ते श्रद्धान करी सम्यग्द्रष्टि थाय अने त्यार पछी चरणानुयोग अनुसार व्रतादिक धारण करी व्रती थाय. ए प्रमाणे मुख्यपणे तो नीचली दशामां ज द्रव्यानुयोग कार्यकार छे तथा गौणपणे जेने मोक्षमार्गनी प्राप्ति थती न जणाय तेने पहेलां कोई व्रतादिकनो उपदेश आपवामां आवे छे माटे उच्च दशावाळाओने अध्यात्म उपदेश अभ्यास करवा योग्य छेएम जाणी नीचली दशावाळाओए त्यांथी पराङ्मुख थवुं योग्य नथी.’’ ४६.

इति श्री समन्तभद्रस्वामि विरचित उपासकाध्ययननी
श्री प्रभाचन्द्र विरचित टीकानो बीजो
परिच्छेद पूर्ण थयो. २.

१. प्रशस्तिकेयं ख पुस्तके नास्ति २. मोक्षमार्ग प्रकाशकगुजराती आवृत्तिपृष्ठ २७४,

वधु माटे जुओ पृष्ठ २८६ थी २८९, २९४, २९५.

३. मोक्षमार्ग प्रकाशक पृष्ठ २९४, २९५.