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द्रव्यानुयोगनो अभ्यास कर्या करे तो ते तत्त्वज्ञान टकी रहे, न करे तो भूली पण जाय, अथवा संक्षेपताथी तत्त्वज्ञान थयुं हतुं ते अहीं नाना युक्ति – हेतु – द्रष्टान्तादि वडे स्पष्ट थई जाय तो पछी तेमां शिथिलता थई शके नहि अने तेना अभ्यासथी रागादिक घटवाथी अल्पकाळमां मोक्ष सधाय. ए प्रमाणे द्रव्यानुयोगनुं प्रयोजन जाणवुं......’’२
‘‘शंकाः — द्रव्यानुयोगरूप अध्यात्म उपदेश छे, ते उत्कृष्ट छे अने ते उच्च दशाने प्राप्त होय तेने ज कार्यकारी छे पण नीचली दशावाळाओने तो व्रत – संयमादिनो ज उपदेश आपवो योग्य छे.’’
‘‘समाधानः – जिनमतमां तो एवी परिपाटी छे के पहेलां सम्यक्त्व होय, पछी व्रत होय; हवे सम्यक्त्व तो स्व – परनुं श्रद्धान थतां थाय छे तथा ते श्रद्धान करी सम्यग्द्रष्टि थाय अने त्यार पछी चरणानुयोग अनुसार व्रतादिक धारण करी व्रती थाय. ए प्रमाणे मुख्यपणे तो नीचली दशामां ज द्रव्यानुयोग कार्यकार छे तथा गौणपणे जेने मोक्षमार्गनी प्राप्ति थती न जणाय तेने पहेलां कोई व्रतादिकनो उपदेश आपवामां आवे छे माटे उच्च दशावाळाओने अध्यात्म उपदेश अभ्यास करवा योग्य छे — एम जाणी नीचली दशावाळाओए त्यांथी पराङ्मुख थवुं योग्य नथी.’’३ ४६.
१. प्रशस्तिकेयं ख पुस्तके नास्ति । २. मोक्षमार्ग प्रकाशक – गुजराती आवृत्ति – पृष्ठ २७४,
३. मोक्षमार्ग प्रकाशक पृष्ठ २९४, २९५.