Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १३७

प्रयोजनस्य फलस्य वृत्तिः प्राप्तिर्येन स तथाविधः पुरुषः को, न कोऽपि प्रेक्षापूर्वकारी, सेवते नृपतीन् ।।४८।। जेने अपेक्षा नथीअभिलाषा नथी, तेवो कोण पुरुष राजाओनी सेवा करे? अर्थात् कोई पण बुद्धिमान मनुष्य न करे.

भावार्थ :रागद्वेषनी निवृत्ति थवाथी (अर्थात् भावहिंसा दूर थतां) हिंसादिक पांच पापना त्यागरूप चारित्रनी स्वयं उत्पत्ति थाय छे. जेने धनप्राप्तिनी इच्छा न होय ते पुरुष राजाओनी सेवा केम करे? न ज करे; तेम जे पुरुषने रागद्वेषनो अभाव छे ते हिंसादि पापकार्य केम करे? न ज करे.

विशेष

हिंसाना बे प्रकार छेएक भावहिंसा अने बीजी द्रव्यहिंसा. प्रमत्तयोग अर्थात् रागादिभावनी उत्पत्तिने भावहिंसा कहे छे अने पोताना या पर जीवना द्रव्यप्राणोना अभावनेवियोगनेघातने द्रव्यहिंसा कहे छे.

श्री अमृतचंद्राचार्ये ‘पुरुषार्थसिद्ध्युपाय’मां अहिंसाहिंसानुं लक्षण दर्शावतां कह्युं छे के

अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति
तेषामेवोत्पत्तिर्हिंसेति जिनागमस्य संक्षेपः ।।४४।।

वास्तवमां रागादिनुं प्रगट न थवुं ते अहिंसा छे अने रागादि भावोनी उत्पत्ति होवी ते हिंसा छे. आ जैन आगमनुं (जैन सिद्धांतनुं) संक्षिप्त रहस्य छे.

वळी आगळ कहे छे के केवळ द्रव्य प्राणोनी हिंसा ते वास्तवमां हिंसा नथी

युक्ताचरणस्य सतो रागाद्यावेशमन्तरेणापि
न हि भवति जातु र्हिंसा प्राणव्यपरोपणादेव।।४५।।

योग्य आचरणवाळा (समितिपूर्वक आचरण करवावाळा) सत् पुरुषने (मुनिने), रागादिना आवेश विना, केवळ द्रव्यप्राणोना वियोगथी ज हिंसा थती नथी.

आथी स्पष्ट छे के वास्तवमां भावहिंसा ज हिंसा छे. द्रव्यहिंसा ते हिंसा नथी, कारण के प्रमत्तयोगवाळा पुरुषने अंतरंगमां भावहिंसा छे, तेथी बाह्यमां द्रव्यहिंसा नहि होवा छतां तेने हिंसानुं पाप लागे छे अने कर्मनो बंध थाय छे, किन्तु समितिपूर्वक आचरण करनार मुनिने भावहिंसानो अभाव होवाथी तेना पग तळे कोई जीव अचानक