Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १३९

अपि तु ‘मैथुनसेवापरिग्रहाभ्यां’ एतेभ्यः कथंभूतेभ्यः ? ‘पापप्रणालिकाभ्यः’ पापस्य प्रणालिका इव पापप्रणालिका आस्रवणद्वाराणि ताभ्यः कस्य तेभ्यो विरतिः ? ‘संज्ञस्य’ सम्यग्जानातीति संज्ञः तस्य हेयोपादेयतत्त्वपरिज्ञानवतः ।।४९।। मैथुनसेवापरिग्रहाभ्याम्’ मैथुनसेवन अने परिग्रहथी पण (विरति छे.) केवा तेमनाथी? पापप्रणालिकाभ्यः’ जेओ पापरूपी प्रणालिकाओआस्रवद्वारो छेतेमनाथी. विरति कोने होय छे? संज्ञस्य’ हेयउपादेय तत्त्वोना परिज्ञानथी युक्त सम्यक्प्रकारे जाणनार एवा संज्ञ (सम्यग्ज्ञानी) तेमने (तेमनाथी विरति होय छे.)

भावार्थ :पापना कारणभूत हिंसा, जूठ, चोरी, कुशील अने परिग्रह पांच पापोथी (एकदेश वा सर्वदेश) विरक्त थवुं अर्थात् तेमनो वीतरागभाव वडे त्याग करवो ते सम्यग्ज्ञानीनुं सम्यक्चारित्र छे.

जे हिंसादि पापभाव थाय छे तेनाथी विरति थतां जविरक्त भाव थतां ज हिंसादि द्रव्यक्रियाओनो स्वयं त्याग थई जाय छे. तेमनो त्याग करवो ए व्यवहारनयनुं कथन छे. वास्तवमां जीव परद्रव्योना ग्रहणत्याग करी शकतो नथी. अज्ञान अवस्थामां अशुद्ध निश्चयनये ते ग्रहणत्यागनो मात्र भाव करी शके, ज्ञान अवस्थामां पर पदार्थो अने तेमनां ग्रहणत्यागनो विकल्प बंने पोताना ज्ञानमां ज्ञेयरूपे ज प्रवर्ते छे.

चारित्ररूप खरो त्याग भाव हेयउपादेय तत्त्वोने सम्यक्प्रकारे जाणनार ज्ञानीने ज होय छे. मिथ्याद्रष्टिअज्ञानीने होतो नथी.

पुरुषार्थसिद्धिउपायमां कह्युं छे के

‘‘अज्ञानपूर्वक चारित्र सम्यक् नाम पामतुं नथी, तेथी सम्यग्ज्ञाननी पछी सम्यक्चारित्रनी आराधना करवी कही छे.’’

अर्थात् सम्यग्दर्शनपूर्वक सम्यग्ज्ञान विना जे बाह्य चारित्र पाळे छे ते बधुं बालचारित्र या मिथ्याचारित्र कहेवाय छे.

श्रावकने एकदेश वीतरागता थतां निमित्तनैमित्तिक संबंध तरीके व्रतनुं पालन होय छे, तेने व्यवहारचारित्र कहे छे अने ते एकदेश वीतरागता साथे हेयबुद्धिए होय छे. ४९. १. न हि सम्यग्व्यपदेशं चारित्रमज्ञानपूर्वकं लभते

ज्ञानान्तरमुक्तं चारित्राराधनं तस्मात् ।।३८।। (पुरुषार्थसिद्धिउपाय३८)