Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 51 vikalchAritranA bhed.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १४१
तत्र विकलमेव तावच्चारित्रं व्याचष्टे
गृहिणां त्रेधा तिष्ठत्यगणु - गुण - शिक्षाव्रतात्मकं चरणम्
पञ्च-त्रि - चतुर्भेद त्रयं यथासङ्ख्यमाख्यातम् ।।५१।।

त्यागरूपअणुव्रतरूप होय छे अने ते गृहादि एकदेश परिग्रह सहित गृहस्थोने होय छे.

विशेष

जो मुनि अभ्यंतर परिग्रहथी रहित न होय अने मात्र बाह्य परिग्रहथी ज रहित होय तो तेवा मुनिने मिथ्याद्रष्टि द्रव्यलिंगी मुनि कह्या छे.

पंचम गुणस्थानवर्ती श्रावकना संबंधमां पण एम ज समजवुं. जो तेने अभ्यंतर परिग्रह अर्थात् मिथ्यात्व, अनंतानुबंधी अने अप्रत्याख्यान संबंधी क्रोधमानमायालोभ न छूट्यां होय अने मात्र बाह्य एकदेश परिग्रहनो ज त्याग होय तो ते पण मिथ्याद्रष्टि द्रव्यलिंगी श्रावक कहेवाय छे.

श्री समयसार गाथा ४१४नी टीकामां श्री जयसेनाचार्ये कह्युं छे के

‘‘........शालितंदुलने बहिरंग तुष विद्यमान होतां, अभ्यंतर तुषनो त्याग करी शकातो नथी. अभ्यंतर तुषनो त्याग थतां, बहिरंग तुषनो त्याग नियमथी होय छे ज. आ न्यायथी सर्व संगना परित्यागरूप बहिरंग द्रव्यलिंग होतां, भावलिंग होय के न होय, नियम नथी. परंतु अभ्यंतरमां भावलिंग होतां, सर्व संगना परित्यागरूप द्रव्यलिंग होय ज छे......’’ ५०.

तेमां प्रथम विकलचारित्र कहे छे

विकलचारित्रना भेद
श्लोक ५१

अन्वयार्थ :[गृहिणाम् ] गृहस्थोनुं [चरणं ] (विकल) चारित्र १. तद इति ग पुस्तके २. ‘‘न हि शालितंदुलस्य बहिरंगतुषे विद्यमाने सत्यभ्यंतरतुषस्य त्यागः कर्तृमायाति अभ्यंतरतुषत्यागे

सति बहिरंग तुषत्यागो नियमेन भवत्येव अनेन न्यायेन सर्वसंगपरित्यागरूपे बहिरंग द्रव्यलिंगे सति
भावलिंगं भवति न भवति वा नियमो नास्ति, अभ्यंतरे तु भावलिंगे सति सर्वसंगपरित्यागरूपं द्रव्यलिंगं
भवत्येवेति.......’’
(श्री समयसार गाथा ४१४ श्री जयसेनाचार्यकृत टीका पृष्ठ ५३९)