कहानजैनशास्त्रमाळा ]
त्यागरूप – अणुव्रतरूप होय छे अने ते गृहादि एकदेश परिग्रह सहित गृहस्थोने होय छे.
जो मुनि अभ्यंतर परिग्रहथी रहित न होय अने मात्र बाह्य परिग्रहथी ज रहित होय तो तेवा मुनिने मिथ्याद्रष्टि द्रव्यलिंगी मुनि कह्या छे.
पंचम गुणस्थानवर्ती श्रावकना संबंधमां पण एम ज समजवुं. जो तेने अभ्यंतर परिग्रह अर्थात् मिथ्यात्व, अनंतानुबंधी अने अप्रत्याख्यान संबंधी क्रोध – मान – माया – लोभ न छूट्यां होय अने मात्र बाह्य एकदेश परिग्रहनो ज त्याग होय तो ते पण मिथ्याद्रष्टि द्रव्यलिंगी श्रावक कहेवाय छे.
श्री समयसार गाथा ४१४नी टीकामां श्री जयसेनाचार्ये कह्युं छे के —
‘‘........शालितंदुलने बहिरंग तुष विद्यमान होतां, अभ्यंतर तुषनो त्याग करी शकातो नथी. अभ्यंतर तुषनो त्याग थतां, बहिरंग तुषनो त्याग नियमथी होय छे ज. आ न्यायथी सर्व संगना परित्यागरूप बहिरंग द्रव्यलिंग होतां, भावलिंग होय के न होय, नियम नथी. परंतु अभ्यंतरमां भावलिंग होतां, सर्व संगना परित्यागरूप द्रव्यलिंग होय ज छे......’’२ ५०.
तेमां प्रथम विकलचारित्र कहे छे —
अन्वयार्थ : — [गृहिणाम् ] गृहस्थोनुं [चरणं ] (विकल) चारित्र १. तद इति ग पुस्तके । २. ‘‘न हि शालितंदुलस्य बहिरंगतुषे विद्यमाने सत्यभ्यंतरतुषस्य त्यागः कर्तृमायाति । अभ्यंतरतुषत्यागे
भवत्येवेति.......’’(श्री समयसार गाथा ४१४ श्री जयसेनाचार्यकृत टीका पृष्ठ ५३९)