Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १४७

चरसत्त्वहिंसां न करोमि चरसत्त्वान् हिनस्मीति स्वयं वचनं नोच्चारयामीत्यर्थः वचसा चरसत्त्वहिंसां न कारयामि चरसत्त्वान् हिंसय हिंसयेति वचनं नोच्चारयामीत्यर्थः तथा वचसा चरसत्त्वहिंसां कुर्वन्तं नानुमन्ये, साधुकृतं त्वयेति वचनं नोच्चारयामीत्यर्थः तथा कायेन चरसत्त्वाहिंसां न करोमि, चरसत्त्वहिंसने दृष्टिमुष्टिसन्धाने स्वयं कायव्यापारं न करोमीत्यर्थः तथा कायेन चरसत्त्वहिंसां न कारयामि, चरसत्त्वहिंसने कायसंज्ञया परं न प्रेरयामीत्यर्थः तथा चरसत्त्वहिंसां कुर्वन्तमन्यं नखच्छोटिकादिना कायेन नानुमन्ये इत्युक्तम- हिंसाणुव्रतम् ।।५३।।


न आपुंआणे सुंदर कर्युंएवो मनमां संकल्प हुं न करुं. एवो अर्थ छे.

४. ए प्रमाणे वचनथी हुं स्वयं त्रस जीवोनी हिंसा न करुंत्रस जीवोनी हिंसा करुं एवुं वचन स्वयं उच्चारुं नहिएवो अर्थ छे. ५. वचनथी त्रस जीवोनी हिंसा हुं (बीजा पासे) न करावुंत्रस जीवोनी ‘हिंसा कर, हिंसा कर’ एवुं वचन हुं उच्चारुं नहि. एवो अर्थ छे. ६. तथा वचनथी त्रस जीवोनी हिंसा करनारने हुं अनुमति आपुं नहि ‘ते ठीक कर्युं’एवुं वचन हुं उच्चारुं नहि. एवो अर्थ छे.

तथा ७. कायथी, त्रस जीवोनी हिंसा हुं करुं नहित्रस जीवोनी हिंसा करवामां द्रष्टि अने मुष्टिना संधानमां हुं स्वयं कायनो व्यापार करुं नहि. एवो अर्थ छे. ८. तथा कायथी त्रस जीवोनी हिंसा हुं (कोईनी पासे) करावुं नहित्रस जीवोनी हिंसा करवामां कायनी संज्ञाथी (संकेतथी) बीजाने हुं प्रेरुं नहि. एवो अर्थ छे. ९. तथा त्रस जीवोनी हिंसा करता अन्यने नख द्वारा, चपटी आदिरूप कायथी हुं अनुमति आपुं नहिएम अहिंसाणुव्रत कह्युं.

भावार्थ :मनथी कृत, कारित अने अनुमोदनारूप, वचनथी कृत, कारित अने अनुमोदनारूप, तथा कायथी कृत, कारित अने अनुमोदनारूपएवा नव संकल्पोथी इरादापूर्वक त्रस जीवोनी हिंसा करवानो भाव न करवो तेने अहिंसाणुव्रत कहे छे. आ प्रमाणे अहिंसाणुव्रतीने संकल्पी हिंसानो त्याग होय छे.

नव संकल्पोथी (नव कोटिथी) त्रस जीवोनी हिंसाना भावनो त्याग तो मुनि अने श्रावक बंनेने होय छे, परंतु स्थावर जीवोनी हिंसानो नव कोटिए त्याग तो एकला मुनिने ज होय छे; श्रावकने होतो नथी. १. करोमीत्यर्थ इति क ख पाठः