Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 145 of 315
PDF/HTML Page 169 of 339

 

कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १५५

सत्यमपि परस्य ‘विपदे’ऽपकाराय भवति ।।५५।।

साम्प्रतं सत्याणुव्रतस्यातीचारानाह होवा छतां बीजाने विपदे’ अपकाररूप थाय तेवुं (तेवुं सत्य पण पोते बोले नहि).

भावार्थ :जे बोलवाथी राजादि स्वपरनो वधबंधादि करे तेने स्थूळ जूठ कहे छे. सत्याणुव्रती आवुं जूठ स्वयं बोले नहि अने बीजा पासे बोलावे नहि. सत्य पण जो अन्यने अहितकरविघातक होय तो तेवुं सत्य पण ते बोले नहि. जेम के पासे थईने हरण जतुं जोयुं होय, छतां शिकारी तेने (व्रतीने) ते विषे पूछे तो ते सत्य कहे नहि, कारण के तेवुं बोलवाथी शिकारी द्वारा हरणनो घात थवा संभव छे, तेथी अन्यने आपत्ति आवी पडे तेवुं सत्य वचन पण पोते बोले नहि, तेम ज अन्य पासे बोलावे नहि, आवा स्थूळ असत्य त्यागने गणधरादि महापुरुषो सत्याणुव्रत कहे छे.

विशेष

‘‘जे कांई प्रसाद कषायना योगथी स्वपरने हानिकारक अथवा अन्यथारूप वचन कहेवामां आवे छे, तेने अनृत (जूठुं) वचन जाणवुं.......’’

‘‘असत्य सामान्यरूपे गर्हित, पाप सहित अने अप्रियएम त्रण प्रकारनुं मानवामां आव्युं छे......’’

सत्यअणुव्रतधारी क्रोधमानमायालोभ वश एवुं वचन न कहे जेथी अन्यनो घात थाय, अन्यने अपवाद लागेकलंक चढे, कलह, विसंवाद पेदा थाय, विषयानुराग वधी जाय, महा आरंभमां प्रवृत्ति थाय, अन्यने आर्त्तध्यान थई जाय, परना लाभमां अन्तराय आवे, परनी आजीविका बगडी जाय, पोतानो अने परनो अपयश थाय, आपदा आवे, अनर्थ पेदा थाय, अन्यनो मर्मच्छेद थाय, राजा दंड करे, धननी हानि थाय वगेरे........आवां सत्य वचन होय तोपण तेने जूठां वचन छे. वळी ते गालीनां वचन, अपमाननां वचन, तिरस्कारनां वचन, अहंकारनां वचन वगेरे बोले नहि, कारण के ते कषाययुक्त होवाथी असत्य वचनो छे. वळी ते जिनसूत्रने अनुकूळ तथा स्वपरना हितरूप, बहु प्रलापरहित, प्रामाणिक, संतोष उपजावनार, धर्मनो उद्योत करनार वचन कहेएवां वचन बोलनार गृहस्थी स्थूळ असत्यनो त्यागी छे. १. जुओ पुरुषार्थसिद्धिउपाय, श्लोक ९१ अने ९५ थी १०१. २. जुओ, श्री रत्नकरंड श्रावकाचारपंडित सदासुखदासकृत हिन्दी टीका पृष्ठ ८२.