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‘परिवादो’ मिथ्योपदेशोऽभ्युदयनिःश्रेयसार्थेषु क्रियाविशेषेष्वन्यस्यान्यथा- प्रवर्तनमित्यर्थः । ‘रहोऽभ्याख्या’ रहसि एकान्ते स्त्रीपुंसाभ्यामनुष्ठितस्य क्रियाविशेषस्याभ्याख्या
पुरुषार्थसिद्धि – उपायमां कह्युं छे के —
‘‘.....आ बधां ज वचनोमां प्रमत्तयोग ज एक हेतु कहेवामां आव्यो छे, तेथी असत्य वचनमां पण (प्रमत्तयोगनो सद्भाव होवाथी) हिंसा निश्चित थाय छे.’’ (श्लोक ९९)
‘‘जूठ वचनना त्यागी महामुनि हेय अने उपादेयनो वारंवार उपदेश करे छे. त्यां पापनी निंदा करतां पापी जीवने (पोताना दोषना कारणे) तेमनो उपदेश बूरो लागे छे, अथवा कोईने धर्मोपदेश खराब लागे ते दुःख पामे, पण ते आचार्योने (उपदेश सांभळनारनी लागणी दुःखावा छतां) जूठनो दोष लागतो नथी. केम के तेमने प्रमाद (कषाय) नथी, प्रमादपूर्वक वचनमां ज हिंसा छे. तेथी ज कह्युं छे के प्रमाद सहित योगथी वचन बोलवां ते ज जूठ जे, अन्यथा नहि.’’ (श्लोक १००नो भावार्थ). ५५
हवे सत्याणुव्रतना अतिचारो कहे छे —
अन्वयार्थ : — [परिवादरहोभ्याख्या ] मिथ्या (खोटो) उपदेश देवो, कोईनी गुप्त क्रियाने प्रगट करी देवी, [पैशुन्यम् ] अन्यनो अभिप्राय जाणी तेने इर्षाथी प्रगट करवो, [कूटलेखकरणम् ] खोटो लेख (दस्तावेज) लखवो, [च ] अने [न्यासापरिहारितापि ] गीरो राखेली वस्तुने पण अंशे हडप करी जवानां (पचावी पाडवानां वचनो बोलवां) — ए [पञ्च ] पांच [सत्यस्य ] सत्याणुव्रतना [व्यतिक्रमाः ] अतिचारो छे.
टीका : — ‘परिवादो’ मिथ्या उपदेश अर्थात् स्वर्ग अने मोक्षनी प्रयोजनवाळी क्रियाविशेषोमां कोईनुं अन्यथा समापन करवुं ते परिवाद (मिथ्या उपदेश) छे. ‘रहोऽभ्याख्या’ एकांतमां स्त्री – पुरुष द्वारा करेली कोई विशिष्ट क्रियाने प्रगट करवी ते