Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १५७

प्रकाशनं ‘पैशुन्यं’ अंगविकारभ्रूविक्षेपादिभिः पराभिप्रायं ज्ञात्वा असूयादिना तत्प्रकटनं साकारमंत्रभेद इत्यर्थः ‘कूटलेखकरणं’ च अन्येनानुक्तमननुष्ठितं यत्किंचिदेव तेनोक्त- मनुष्ठितं चेति वंचनानिमित्तं कूटलेखकरणं कूटलेखक्रियेत्यर्थः ‘न्यासापहारिता’ द्रव्यनिक्षेप्तु- र्विस्मृतसंख्यस्याल्पंसंख्यं द्रव्यमाददानस्य एवमेवेत्यभ्युपगमवचनं एवं परिवादादयश्चत्वारो न्यासापहारिता पंचमीति सत्यस्याणुव्रतस्य पंच ‘व्यतिक्रमाः’ अतीचारा भवन्ति ।।५६।। रहोभ्याख्या छे. पैशुन्यम्’ शरीरनी चेष्टाथी अने भवांनी क्रिया आदिथी बीजानो अभिप्राय जाणीने, इर्षाथी ते प्रगट करवो ते साकार मंत्रभेद छेएवो अर्थ छे. कूटलेखकरणम्’ बीजा द्वारा कांईपण नहि कहेला अने नहि करेलाने ‘तेणे कह्युं छे अने तेणे कर्युं छे’ एम तेने ठगवाना हेतुथी जूठो दस्तावेज (लेख) लखवो ते कूटलेख क्रिया छेएवो अर्थ छे. न्यासापहारिता’ वस्तु गीरो मूकनार (Depositor) वस्तुनी संख्या भूली जाय अने ओछी वस्तु मागे तो लेनारने हा, एटली ज छे, ए ज छेएवुं वचन कहेवुं ते (न्यासापहारिता) छे. ए प्रमाणे परिवाद (मिथ्योपदेश). आदि चार अने न्यासापहारिता पांचमुंएम बधा मळी सत्यस्य’ सत्याणुव्रतना पांच व्यतिक्रमाः’ अतिचारो छे.

भावार्थ :सत्याणुव्रतना पांच अतिचार छे
१. परिवादमिथ्या उपदेश; अभ्युदय अने कल्याणकारक कार्योमां अन्यथा उपदेश
देवो.
२. रहोभ्याख्यास्त्रीपुरुषो द्वारा एकान्तमां करेली क्रियाने प्रगट करवी.
३. पैशुन्य (साकार मंत्र भेद)चाडी करवी अथवा शरीरनी अने भवांनी चेष्टाथी
बीजानो अभिप्राय जाणी लई इर्षाथी ते प्रगट करवो.
४. कूटलेख क्रियाबीजाने ठगवा माटे खोटो दस्तावेज करवो.
५. न्यासापहारगिरो मूकेली वस्तुने गिरो मूकनार भूलथी ओछी वस्तु मागे तो

तेने तेटली ज आपवी. नोंधःउपरनी क्रियाओमां नबळाईने लीधे प्रवर्ते छे, तेथी ते अतिचार छे. ५६. १. मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहारसाकारमंत्रभेदाः (तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ७/२६)