Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 60 brahmcharyANuvratanA atichar.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १६३
तस्यातीचारानाह
अन्यविवाहाकरणानङ्गक्रीडाविटत्वविपुलतृषः
इत्वरिकागमनं चास्मरस्य पञ्च व्यतीचाराः ।।६०।।

‘अस्मरस्या’ ब्रह्मनिवृत्त्यगुणव्रतस्य पंच व्यतीचाराः कथमित्याह - पुरुष साथे रमवुं नहि अने अन्य स्त्रीने तेम करवा प्रेरवी नहि.

विशेष

पुरुषवेद, स्त्रीवेद अने नपुंसकवेदना परिणमनरूप रागभाव (प्रमाद) सहितना योगथी स्त्रीपुरुष मळीने कामसेवननो भाव करवो ते कुशील छे. तेमां प्राणीवधनो सर्वत्र सद्भाव होवाथी हिंसा थाय छे.

स्त्रीनी योनि, नाभि, कुच (स्तन) अने काखमां मनुष्याकारना असंख्य पंचेन्द्रिय जीव उत्पन्न थाय छे; तेथी स्त्री साथे कामसेवन करवाथी आ जीवोनी द्रव्यहिंसा थाय छे. अने स्त्रीपुरुष बंनेने कामरूप परिणाम थाय छे, तेनाथी ते बंनेने भावहिंसा थाय छे. ५९.

तेना (ब्रह्मचर्याणुव्रतना) अतिचार कहे छे

ब्रÙचर्याणुव्रतना अतिचार
श्लोक ६०

अन्वयार्थ :[अन्यविवाहाकरणानङ्गक्रीडाविटत्वविपुलतृषः ] अन्य विवाहकरण (बीजानो विवाह करवो), अनंगक्रीडा (कामसेवनना अंगो छोडी अन्य अंगोथी विषयसेवन करवुं), विटत्व (गाळो बोलवी, अश्लिल वचन बोलवां), विपुल तृषा (विषय सेवनमां बहु इच्छा राखवी) [च ] अने [इत्वरिकागमन ] इत्वरिकागमन (व्यभिचारिणी स्त्रीने त्यां आवजा करवी)[पञ्च ] पांच [अस्मरस्य ] ब्रह्मचर्याणुव्रतना [व्यतीचाराः ] अतिचारो छे.

टीका :अस्मरस्य’ अब्रह्मत्याग अणुव्रतना (ब्रह्मचर्याणुव्रतना) पांच अतिचारो १. अस्य ग पाठः २. जुओ पुरुषार्थसिद्धिउपाय गुजराती आवृत्ति, श्लोक १०७ अने तेनो भावार्थ तथा श्लोक १०८

थी ११०.