कहानजैनशास्त्रमाळा ]
‘अस्मरस्या’ ब्रह्मनिवृत्त्यगुणव्रतस्य । पंच व्यतीचाराः । कथमित्याह — - पुरुष साथे रमवुं नहि अने अन्य स्त्रीने तेम करवा प्रेरवी नहि.
पुरुषवेद, स्त्रीवेद अने नपुंसकवेदना परिणमनरूप रागभाव (प्रमाद) सहितना योगथी स्त्री – पुरुष मळीने कामसेवननो भाव करवो ते कुशील छे. तेमां प्राणीवधनो सर्वत्र सद्भाव होवाथी हिंसा थाय छे.
स्त्रीनी योनि, नाभि, कुच (स्तन) अने काखमां मनुष्याकारना असंख्य पंचेन्द्रिय जीव उत्पन्न थाय छे; तेथी स्त्री साथे कामसेवन करवाथी आ जीवोनी द्रव्यहिंसा थाय छे. अने स्त्री – पुरुष बंनेने कामरूप परिणाम थाय छे, तेनाथी ते बंनेने भावहिंसा थाय छे.२ ५९.
तेना (ब्रह्मचर्याणुव्रतना) अतिचार कहे छे —
अन्वयार्थ : — [अन्यविवाहाकरणानङ्गक्रीडाविटत्वविपुलतृषः ] अन्य विवाहकरण (बीजानो विवाह करवो), अनंगक्रीडा (कामसेवनना अंगो छोडी अन्य अंगोथी विषयसेवन करवुं), विटत्व (गाळो बोलवी, अश्लिल वचन बोलवां), विपुल तृषा (विषय सेवनमां बहु इच्छा राखवी) [च ] अने [इत्वरिकागमन ] इत्वरिकागमन (व्यभिचारिणी स्त्रीने त्यां आव – जा करवी) — ए [पञ्च ] पांच [अस्मरस्य ] ब्रह्मचर्याणुव्रतना [व्यतीचाराः ] अतिचारो छे.
टीका : — ‘अस्मरस्य’ अब्रह्मत्याग अणुव्रतना (ब्रह्मचर्याणुव्रतना) पांच अतिचारो १. अस्य ग पाठः । २. जुओ पुरुषार्थसिद्धि – उपाय गुजराती आवृत्ति, श्लोक १०७ अने तेनो भावार्थ तथा श्लोक १०८