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‘‘मूर्च्छा परिग्रहः। ’’ अध्याय ७/१७ बाह्य धन – धान्यादि पदार्थोमां तथा अंतरंग क्रोधादि कषायोमां ममत्वभाव राखवो ते मूर्च्छा छे.’’
ज्यां ज्यां मूर्च्छा छे त्यां त्यां अवश्य परिग्रह छे अने ज्यां मूर्च्छा नथी त्यां परिग्रह पण नथी. मूर्च्छानी परिग्रह साथे व्याप्ति छे.
कोई जीव नग्न छे, बाह्य परिग्रहथी रहित छे, पण जो तेने अंतरंगमां मूर्च्छा अर्थात् ममत्वपरिणाम होय तो ते परिग्रहवान ज छे; अने एक ममत्वना त्यागी दिगंबर मुनिने उपकरणरूप पीछी, कमंडळ होवा छतां पण अंतरंगमां ममत्व नहि होवाथी ते वास्तविक परिग्रहथी रहित ज छे. (श्लोक ११२नो भावार्थ)
धन – धान्यादि बाह्य वस्तु मूर्च्छा ऊपजाववामां निमित्तमात्र छे; तेथी तेमां कारणमां कार्यनो उपचार करीने तेने उपचारथी परिग्रह कह्यो छे. वास्तवमां परिग्रहनुं लक्षण मूर्च्छा ज छे.
१अंतरंग १४ प्रकारना परिग्रहो हिंसाना पर्याय होवाथी तेमां हिंसा सिद्ध ज छे अने दश प्रकारना बहिरंह परिग्रहोमां ममत्वपरिणाम ज हिंसाभावने निश्चयथी प्राप्त थाय छे. (श्लोक ११९).
केवळीने समवसरणादि विभूति होय छे. पण ममत्वपरिणाम विना ते परिग्रह नथी. जे कोई परिग्रहने अंगीकार करीने कहे के मारे तो तेमां ममत्वपरिणाम नथी, तो ते असत्य छे, कारण के ममत्व विना ते अंगीकार थाय नहि.
ज्यां प्रमाद – योग छे त्यां ज निश्चयथी परिग्रह छे अने ज्यां प्रमाद – योग (ममत्व) नथी, त्यां परिग्रह नथी — एम समजवुं. ६१.
तेना (परिग्रहपरिमाण अणुव्रतना) अतिचार कहे छे — १. अंतरंग चौद परिग्रहः — १. मिथ्यात्व, २. हास्य, ३. रति, ४. अरति, ५. शोक, ६. भय,
अने १४. लोभ.