Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 52.

< Previous Page   Next Page >


Page 82 of 170
PDF/HTML Page 111 of 199

 

समाधितंत्र९५
सुखमारब्धयोगस्य बहिर्दुःखमथात्मनि
बहिरेवासुखं सौख्यमध्यात्मं भावितात्मनः ।।५२।।

टीकाबहिर्बाह्यविषये सुखं भवति कस्य ? आरब्धयोगस्य प्रथममात्मस्वरूपभावनोद्यतस्य अथ आह आत्मनि आत्मस्वरूपे दुःखं तस्य भवति भावितात्मनो यथावद्विदितात्मस्वरूपे कृताभ्यासस्य बहिरेव बाह्यविषयेष्वेवाऽसुखं भवति अथ आह सौख्यं अध्यात्मं तस्याध्यात्मस्वरूप एव भवति ।।५२।।

श्लोक ५२

अन्वयार्थ :(आरब्धयोगस्य) योगनो अभ्यास शरू करनारने (बहिः) बाह्य विषयोमां (सुखं) सुख लागे छे, (अथ) अने (आत्मनि) आत्मस्वरूपने विषे (दुःखं) दुःख प्रतीत थाय (भावितात्मनः) आत्मस्वरूपने यथार्थपणे जाणनारनेसारा अभ्यासीने (बहिः एव) बाह्य पदार्थोमां ज (असुखं) दुःख थाय छे अने (अध्यात्मं) आत्मस्वरूपमां (सौख्यम्) सुखनो अनुभव थाय छे.

टीका :बहार एटले बाह्य विषयमां सुख लागे छे. कोने? योगनो आरंभ करनारने अर्थात् प्रथम वार आत्मस्वरूपनी भावनाना अभ्यासीने, अने कहे छेआत्मामां एटले आत्मस्वरूपमां (तेनी भावनामां) दुःख (मुश्केली) लागे छे, पण भावितात्मने एटले यथावत् जाणेला आत्मस्वरूपना (तेनी भावनाना) अभ्यासीने, बाह्यमां ज एटले बाह्य विषयोमां ज असुख (दुःख) भासे छे; अने कहे छेआत्मामां एटले तेना अध्यात्मस्वरूपमां ज (तेनी भावनामां ज) सुख लागे छे.

भावार्थ :योगनो एटले आत्मस्वरूपनो प्रथम वार अनुभव करवानो आरंभ करनारने बाह्य विषयोमां सुख जेवुं लागे छे अने आत्मस्वरूपनी भावनाना अभ्यासमां दुःख जेवुं जणाय छे, परंतु ज्यारे तेनी परिपक्व अभ्यासथी आत्मस्वरूपनुं यथार्थपणे ज्ञान थाय छे त्यारे तेने बाह्य विषयो असुखरूप प्रतीत थाय छे अने आत्मस्वरूपमां ज सुख प्रतिभासे छे.

योगनो अभ्यास शरू करनारने, पूर्वना संस्कारने लीधे, बाह्य विषयो तरफनुं वलण जलदी छूटतुं नथी अने तेथी तेने आत्मस्वरूपमां रमवुं मुश्केल लागे छे.

प्रारंभे सुख बाह्यमां, दुख भासे निजमांय;
भावितात्मने दुख बर्हि, सुख निजआतममांय. ५२.